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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग ५/८
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सुन्दर महल संवारि कै, राख्यौ कांच लगाइ ।
दैव योग सुनहां गयौ, एक अनेक दिखाइ ॥५॥
अन्य तीन उदाहरण : श्रीसुन्दरदासजी एक अन्य उदाहरण भी देते हैं - आप कोई प्रयत्नपूर्वक विशाल शीशमहल बनाइये । उस में ऊपर नीचे सर्वत्र शीशे जड़े हुए हों । भाग्य से यदि उसमें कभी कोई कुत्ता(सुनहा) पहुँच जाय तो वहाँ शीशे में पड़े अपने प्रतिबिम्बों के कारण उस एकाकी को ही अनेक कुत्ते दिखायी देते हैं ॥५॥
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अपनी छाया देखि कै, कूकर जानै आंन ।
सुन्दर अति ही जोर करि, भुसि भुसि मूवौ स्वांन ॥६॥
वहाँ वह उस शीशे में अपनी छाया(प्रतिबिम्ब) देख कर उसे अन्य कुत्ता समझने लगता है । तथा वह, स्वभावगत जातिविरोध के कारण, उस प्रतिबिम्ब को अन्य कुत्ता समझ कर जोर जोर से भोंकने लगता है । परिणामस्वरूप वह कुत्ता भोंकते भोंकते वहीं मर जाता है ॥६॥ (१)
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सिंह कूप परि आइ कैं, देखी अपनी छांहिं ।
सुन्दर जान्यौ दूसरौ, बूडि मुवौ ता मांहिं ॥७॥
इसी प्रकार किसी मूर्ख सिंह का उदाहरण भी आप ले सकते हैं - जैसे कोई सिंह किसी कूए पर जा कर उसके जल में अपनी परछाई(प्रतिबिम्ब) देखे । उसे देख कर वह गर्जन करे । उस गर्जन को भी कूए से प्रतिध्वनि आवे तो उस प्रतिध्वनि प्रतिबिम्बित सिंह को अन्य सिंह समझ कर क्रुद्ध होता हुआ, उस पर आक्रमण के लिये, छलांग लगावे और वह कूए में कूद कर मर जाय ॥७॥ (२)
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फटिक सिला सौं आय करि, कुंजर तोरै दंत ।
आगै देख्यौ और गज, सुन्दर अज्ञ अत्यंत ॥८॥
इसी प्रकार किसी मूर्ख हाथी का भी, इस प्रसङ्ग में, उदाहरण देखें - कोई मूर्ख हाथी किसी स्फटिक शिला के सम्मुख जाय । वहाँ वह उस शिला को अन्य हाथी समझे और उस शिला के कोणों को हाथी दांत समझे और उस पर क्रुद्ध होकर टक्कर मारने लगे । निरन्तर टक्कर मारता हुआ आहत होकर वह मर जाय ॥८॥ (३)
(ये तीनों ही उदाहरण अपने ही भाव से उत्पन्न सङ्कट के स्पष्ट उदाहरण हैं ।)
(क्रमशः)

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