शुक्रवार, 27 मार्च 2026

परमात्मा की दयालुता

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जिन पहुँचाया प्राण को, उदर उर्ध्व मुख खीर ।*
*जठर अग्नि में राखिया, कोमल काया शरीर ॥*
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राग सोरठि ॥४॥ परमात्मा की दयालुता 
हरि कौ नाँव न भूलूँ भाई । जिनि अैसी कल लाई ॥टेक॥
जिनि जल मांहिं जल बांध्यौ, पवन गाँठि दे सांध्यौ ।
सांध्यि बांधि तत कीया, ले चलता करि दीया ॥
अगनि मांहि जिनि राख्या, यौं राख्या जालि न नाख्या ।
जिनि नीर खीर पहुँचाया, सो मेरे चिति आया ॥
जिनि धरणि अकास न लाया, धरि ऊपरि अधर चलाया ।
चालनहारा चालै, तब यहु बीख न हालै ॥
जो हसै बुलावै बोलै, हलका भारी तोलै ।
अणबोलता सा मांहीं, ताकुँ बषनां भूलै नांहीं ॥८३॥ 
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कल = यंत्र, शरीर । पवन = प्राण । तत = प्राणवान शरीर, एक इकाई । बीख = पैंड, एक पग भर चलना ॥ मैं उस परात्पर-परब्रह्म हरि के नाम को कदापि नहीं भूल सकता जिसने मनुष्य देह जैसा अदभुत यंत्र बनाया है । जिसने वीर्य को रज में रोककर(जल में जल को रोककर, मिलाकर) पंच तत्त्वात्मक स्थूल शरीर को बनाया । 
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उसमें प्राणों का संचार करके सजीवता प्रदान की । इसप्रकार जल में जल को मिलाकर तथा प्राणों का संचार करके तत = एक इकाई = एक शरीर का निर्माण किया । फिर उसमें अपना अंश प्रविष्ट करके उसे चलता-फिरता कर दिया, चैतन्य कर दिया । उस परमात्मा ने इस शरीर को माता की जठराग्नि में जलाकर भस्म नहीं करके पूर्ण सुरक्षित रखा । 
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उस परमात्मा ने ही माता के गर्भ में ही खाने-पीने की सामग्री पहुँचायी । इसी कारण वह परमात्मा मेरे चित्त में चढ़ गया है, मुझे वह प्रिय लगने लगा है । वह परमात्मा गर्भस्थ शिशु को न पृथिवी पर बनाने के लिये लाया और न आकाश में ले गया । 
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उसने तो उसे आकाश के नीचे और पृथिवी के ऊपर माता के गर्भ में ही जो न पृथिवी है और न आकाश है किन्तु अधर है चलने फिरने लायक बना दिया । माता पृथिवी पर चलती है । अतः पृथिवी पर चलते हुए भी गर्भस्थ शिशु अधर ही चलता है । चलने वाली माँ तो चलती-फिरती है किन्तु माँ के चलते-फिरते समय यह एक पैंड़ भी नहीं चलता है । 
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वह परमात्मा इस जीव को हँसाता है, बुलवाता है, बोलता है तथा हल्का-भारी करता है । फिर भी बाह्य दृष्टि वालों को गर्भस्थ जीव बिना बोलता हुआ सा ही माँ के गर्भ में रहता सा प्रतीत होता है । ऐसे परमात्मा को बषनां कभी भी भूल नहीं सकता ॥८३॥ 

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