मंगलवार, 31 मार्च 2026

*नाम-माहात्म्य ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जागहु लागहु राम सौं, छाड़हु विषय विकार ।*
*जीवहु पीवहु राम रस, आतम साधन सार ॥*
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*नाम-माहात्म्य ॥*
भाई रे, नाँव लियाँ निस्तारा । यों गुर कहैं हमारा ॥टेक॥
जोग जग्गि जप जेता । तप तीरथ ब्रत केता ॥
पढ्याँ गुण्याँ जे गाया । सब एक नाँव मैं आया ॥
सेवा संजम पूजा । देव दिहाड़ी दूजा ॥
धरम ध्यान बिस्तारा । सबै नाँव की लारा ॥
सो नाँव छाड़ि क्या कीजै । अैसि काहि बडाई दीजै ॥ 
और सकल ही फीका । हरि नाँव सकल मैं टीका ॥
सो मेरे नाँव अधारा । नाहिं और का सारा ॥
सो नाँव सहज घरि आणैं । रटि बषनां और न जाणैं ॥८७॥
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हे भाई ! भगवान् का नाम रटने से ही भला = कल्याण होता है, ऐसा मेरे गुरुमहाराज कहते हैं ।
“रामचरण हम कहते हैं, कह्या कबीरै राम ।
सकल सासतर सोधिया, कलजुग केवल नाम ॥”
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योगसाधना, यज्ञ करना, सकाम मंत्र जप करना, अग्नि आदि में तपकर तपस्या करना, तीर्थाटन करना, नाना व्रतोपवासादि करना, पढ़ना, चिंतन करना आदि जितने भी भगवत्प्राप्ति के उपाय नाना शास्त्रों में बताये गये हैं वे सभी एक भगवन्नाम जप करने मात्र से किये हुए हो जाते हैं, वे सभी भगवन्नाम में वैसे ही सम्मिलित हो जाते हैं जैसे हाथी के पैर में सभी का पैर समा जाता है ।
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“यज्ञानां जपयज्ञोऽस्मि” मूर्ति की सेवा-पूजा करना, नहाना-धोना आदि संयमों का साधना, देवताओं, शीतलादि देवियों व अन्य-भैरावादि का यजन-पूजन, धर्म-दानादि, ध्यान आदि सभी भगवन्नाम, के पीछे-पीछे चलने वाले हैं अथवा लारा = से हल्के स्तर के हैं ।
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अतः ऐसे नाम को छोड़कर क्यों अन्य मार्ग का अवलंबन किया जाये ? यदि मुझसे पूछा जाये (बषनांजी कहते हैं) तो मैं कहूंगा, नाम के अतिरिक्त और दूसरा कुछ है ही नहीं जिसको इतनी बडाई = महत्त्व दिया जाये । “राम न सकई नाम गुन गाई ॥”
“राम सकल नामन तैं अधिका ।
होहु नाथ अघ खग बधिका ॥”
“ब्रह्म राम तैं नामु बड़, बरदायक बर दानि ।
रामचरित सतकोटि मँह, लिय महेस जियँ जानि ॥”
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इस भगवन्नाम के सामने सभी अन्य साधन फीका = निस्तेज हैं । क्योंकि परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा हरि का नाम ही सबका राजा है, सबका शिरोमणि = प्रधान है । अतः मेरा तो परमाश्रय परमात्मा का नाम ही है । मुझे और किसी के सहारे की आवश्यकता भी नहीं है । वह नाम सहज घर = मुक्ति का दाता है, स्वस्वरूप में अवस्थिति कराने वाला है । बषनां तो बस, इस नाम का ही रटन करता है । वह इसके अतिरिक्त किसी और को जानता ही नहीं ॥८७॥

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