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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग २०/२२
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याही देखत नूर कौं, याही देखत तेज ।
याही देखत जोति कौं, सुन्दर याकौ हेज ॥२०॥
तुम्हारा यह शुभ चिन्तन ही तुम को उस प्रभु के नूर(दिव्य ज्योति) तक पहुँचायगा, यही चिन्तन उसके तेज(दिव्य प्रताप) तक पहुँचायगा । यही तुम्हें उस की दिव्य प्रभा तक पहुँचायगा । अतः तुम उसी प्रभु की अनन्य प्रेमा भक्ति से उसकी आराधना(हेज) करो ॥२०॥
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सुन्दर अपने भाव तें, जन की करै सहाइ ।
बाहिर चढि कै बीठलौ, दुष्ट हि मारै आइ ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - वे निरञ्जन निराकार प्रभु भी उसी भक्त की सहायता करने के लिये आतुर होते हैं जो अपने हृदय से भगवान् से सहायता हेतु पुकार करता है । बीठल एवं नामदेव की हार्दिक पुकार सुनकर भगवान् उनकी सहायता के लिये दौड़े हुए आये थे - यह सभी जानते हैं ॥२१॥
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सुन्दर अपने भाव तें, मूरत पीयौ दुद्ध ।
ठाकुर जान्यौं सत्य करि, नांमां कौ उर सुद्ध ॥२२॥
भक्त(नामदेव) की हार्दिक प्रार्थना पर भगवान् ने उसका दिया हुआ दूध दीवाल से मुख निकाल कर पीया था; क्योंकि भगवान् ने भी जान लिया था कि मेरा भक्त नामदेव१ शुद्ध हृदय से पुकार रहा है ॥२३॥ {१ नामदेव द्वारा भगवान् को दूध पिलाने की कथा श्रीराघोदास की भक्तमाल (५० २८८) में देखें ।}
(क्रमशः)

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