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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*६. गुरु मुख कसौटी का अंग ~ २५/२९*
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*ध्यान१ धनुष गहि सद्गुरु, मारैं वायक२ बाण ।*
*रज्जब सावज३ शर सहित, पड़े परस्पर आण ॥२५॥*
सद्गुरु हृदय-हाथ में विचार१-धनुष लेकर अर्थात अन्त:करण में साधकों के कल्याण को विचार करके साधक-शिकार२ के वचन३-बाण मारते हैं, तब अनेक शिष्य रूप शिकार परस्पर मिलकर वचन-बाण के सहित गुरु के चरणों में आ पड़ते हैं अर्थात वचनों को विचारते हुये गुरुदेव के पास आते हैं ।
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*रज्जब भलका१ भाव का, साँटी२ शब्द सु लाय ।*
*काबिज३ गुरु कमान५ गहि४, मार्या तीर चलाय ॥२६॥*
साधकों का कल्याण करने का विचार रूप धनुष४ ग्रहण३ करने वाले गुरु ने शब्द रूपी लचीली लकड़ी२ पर भाव रूप भल्ल१ लगाकर तैयार किये हुये बाण को उठाया५ और उक्त धनुष पर चढ़ाकर वह तीर साधक-हृदय के मोह-मृग पर मार दिया, मोह नष्ट होते ही साधक का कल्याण हो जाता है ।
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*सद्गुरु शब्द सु मार शर, जो फोड़े त्रयलोक ।*
*रज्जब छेदैं सकल गुण, अइया१ पैनी२ नोक३ ॥२७॥*
जो तीनों लोकों में स्थित साधकों के अज्ञान को तोड़ता है वा अज्ञान नाश द्वारा स्थूल, सूक्ष्म, कारण शरीर रूप तीनों लोकों का अभाव करता है, ऐसा सुन्दर-शब्द रूप बाण मारकर सद्गुरु, शिष्यों के सभी दोष रूप गुणों को नष्ट करके उनकी वृत्ति निर्गुण ब्रह्म में स्थित करते हैं । सद्गुरु के शब्द-बाण का अग्र३ भाग ऐसा१ ही तीखा२ है ।
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*रज्जब रूचे सु रोष रस, सद्गुरु पारस बैन ।*
*प्राणी पलटै लोह ज्यों, लागे कंचन ऐन ॥२८॥*
लोहा पारस की टक्कर लगते ही अपनी पूर्व स्थिति से बदल कर साक्षात् स्वर्ण ही हो जाता है, अत: पारस की टक्कर भी लोह के लिये सुन्दर सिद्ध होती है । वैसे ही सद्गुरु के रोष पूर्ण वचन भी रस-रूप ही भासते हैं, कारण-उनसे प्राणी का हृदय बदल कर ब्रह्म का साक्षात्कार हो जाता है, अत: वे रुचिकर ही सिद्ध होते हैं ।
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*शिष लोहा पारस गुरु, सज्यौं त्यों राम मिलाव ।*
*रज्जब भवै रोष रस, परसे कंचन भाव१ ॥२९॥*
जैसे पारस की टक्कर भी लोह को स्वर्ण की आकृति१ में बदल देती है । वैसे ही सद्गुरु के रोषपूर्ण वचन भी प्राणी को राम से मिलाकर पूर्वावस्था से बदल देते हैं, अत: रस रूप ही भासते हैं और सभी साधकों को प्रिय लगते हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “६. गुरु मुख कसौटी का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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