🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*अति आतुर ये खोजत डोलैं,*
*बान परी वियोगिनि बोलैं ॥*
*सब हम नारी दादू दीन,*
*दे सुहाग काहू संग लीन ॥*
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*विरह, आत्मसाक्षात्कार ॥*
आपणा रमइया कारणि, जोगणि ह्वै हूँ रे ।
पहिरूँ रे भसमी मुद्राली, बनखँडि जैहूँ रे ॥टेक॥
बिरह बिभूति भई तनि मेरै, सींगी सुरति हमारै रे ।
बैरागनि ह्वै वनखँडि जैहूँ, दरसन काज तुम्हारै रे ॥
सोइ बैराग एकटक आगैं, पलभरि पलक न लागै रे ।
रावल कै कारणि रौलानी, चेतनि पहरै जागै रे ॥
ग्यानि गुफा मैं रहणि हमारी, उनमनि ताली लाऊँ रे ।
अनहद बाजे बाजैं रावल, कींगरड़ी झुणकाऊँ रे ॥
अणभै भिख्या घर अबिनासी, चल तहाँ करै प्रवेसा रे ।
बषनां दरसन देषि करीजै, वा आइस कौं आदेसा रे ॥
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अपनी भावना व्यक्त करते हुए बषनांजी कहते हैं । मैं अपने प्रियतम रमैयाराम को प्राप्त करने के लिये योगियों की भस्म, मुद्रा, सींगी, सेली आदि लगाकर व पहनकर योगिनी बनूंगी । मैं शरीर पर भस्म लगाऊंगी, कानों में मुद्रा पहनूंगी तथा प्रियतम को रिझाने के लिये एकान्त बनखंड में चली जाऊंगी ।
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परम प्रियतम के अमिलन से उत्पन्न चित्त में आकुलता-व्याकुलता रूपी विरह की भस्म ही मेरे शरीर पर रमी होगी । चित्त की वृत्ति = सुरति का प्रियतम से सदैव तादात्म्य ही गले में लटकने वाली सींगी होगी । प्रियतम का सदैव नाम श्रवण ही कानों मुद्रा होगी । संसार तथा संसार के समस्त पदार्थों, सुखों से तन और मन से अनासक्ति रूपी वनखंड में निवास करने को जाउंगी ।
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यह सब मैं इसलिये करूंगी कि हे प्रियतम ! आपके दर्शन हो जाएँ, आपसे मेरा चिरसंयोग हो जाये । इस एकान्तिकी, अनन्य वैराग्य के सामने एक पल के लिये भी मेरी आँखों की पलकें नीचे को नहीं गिरेंगी । क्योंकि आप रावल(योगियों का एक भेद) के कारण मैं रौलानी = जोगन पूर्ण सावधान होकर(चेतनि) आपके जाने के रास्ते में पहरा देती रहूंगी । अर्थात् मैं अपलक जागकर आपके आने की, दर्शन देने की प्रतिक्षा करूंगी ।
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इस समय मेरी रहनी = दिनचर्या = क्रियाकलाप ज्ञानमय होंगे । (आत्मा अपने आपको परमात्मा जानकर परमात्मा ही अनुभव करे, दोनों को एक अनुभव करे, यही ज्ञान है । गुफा = आवरण । यहाँ ‘ज्ञान के आश्रय में’ से तात्पर्य है । अर्थात् इस समय मेरे सारे क्रियाकलाप ज्ञानमय होंगे) तथा मैं उनमनि = सहजावस्था = निर्विकल्प समाधि अवस्था से ताली = सम्बन्ध स्थापित कर लूंगी अर्थात् समस्त द्वन्द्वों से अतीत होकर निर्विकल्प सहजावस्था में स्थिर हो जाऊंगी ।
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इस समय रावल = परमप्रियतम अनहदनाद रूपी बाजे के रूप में तथा मैं पायल की झुनकार के रूप में बजूंगी अर्थात् हम दोनों इस अवस्था में दो न रहकर एक नाद स्वरूप हो जायेंगे । पाठकों को ज्ञात हो, ब्रह्मरंध्र में जब शब्द-सुरति का एकाकार होता है तब वहाँ परमप्रकाश हो जाता है तथा अनहदनाद होता है । वहाँ मूर्ति, आकृति आदि कुछ नहीं होती ।
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सुषुम्ना से अमृत की धारा का प्रवाह भी यहाँ अनवरत चलता रहता है । “स्त्रवै सुषुम्ना नीर फुवारा । सुन्य सिखर का यह व्यवहारा ॥” बषनांजी अपने आपको संबोधित करते हुए कहते हैं, अब हमें चलकर अविनाशी परमात्मा के घर में प्रवेश करना चाहिये जहाँ उसकी अणभै = अपरोक्ष साक्षात्कार रूपी भिक्षा मिलती है । उस आइस = योगी = परमप्रियतम का दर्शन = अपरोक्ष साक्षात्कार प्राप्त करके उसका अभिवादन करूंगा ॥७४॥

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