रविवार, 29 मार्च 2026

मन मूरिखा रे

 
🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू जग दिखलावै बावरी, षोडश करै श्रृंगार ।*
*तहँ न सँवारे आपको, जहँ भीतर भरतार ॥*
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*सच ॥*
मन मूरिखा रे, कहीं अनत न बहिये ।
मनसा ठौर राखि, केवल राम नाम कहिये ॥टेक॥
ऊपराँ पाणी पखालै, मांहिला मैल न जांहिला ।
न्हायाँ धोयाँ जे तिरै, तौ मींडक पाणी मांहिला ॥
बादि ही मूरिख मूँड मुँडायौ, मन मांहै काती बुरी ।
मूँड मुँडायाँ जे भौ तिरै, तौ भेड़ जाइ सरगापुरी ॥
बहुत दिन लग दूध पीयौ, देही राखी आछियाँ ।
दूधाधारी जे तिरै, तौ पहिली तिरसें बाछियाँ ॥
राम नाम न लियौ काथ पीयौ, अरु अंग न वौढ्यौ कापड़ा ।
इहिं करणीं बैंकुठि जासी, तोही ज म्रिधा बापड़ा ॥
राम नाम तारै राम नाम तिरै, आन मारग मति गहै ।
बषनां कोई बुरौ मानैं, तौ बूझौ जाइ गीता कहै ॥८५॥
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हे मूर्ख मन ! अपनी वृत्ति को केवल राम-राम-स्मरण रूपी सुस्थान, शुभकार्य में लगा कर रख । इसे राम-नाम-स्मरण के अतिरिक्त अन्य किसी भी विषय की ओर मत जाने दे । याद रख, शरीर को ऊपर से पानी से धोने से कुछ भी होने वाला नहीं है क्योंकि अंदर रहने वाले मन के मैल तो पानी से धुलते नहीं हैं ।
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यदि नहाने-धोने से ही मुक्ति मिलती हो तो मैंड़क तो सदैव पानी में ही रहता है । उसकी मुक्ति तो हो ही जानी चाहिये किन्तु होती नहीं है । अतः नहाना-धोना भ्रम है । मूर्ख व्यर्थ ही शिर को मुंडवाता है जबकि मन में बुरा चिंतन करता है । यदि मूंड मुंडाने से ही भवसागर से पार जाना संभव है तो भेड़ सर्वप्रथम मोक्ष को प्राप्त होगी क्योंकि उसके शरीर से तो वर्ष में कई बार बाल काटे जाते हैं ।
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बहुत दिनों तक अन्न का त्याग करके मात्र दूध का आहार किया और शरीर को निरोग रखा । यदि दूधाहारियों की मुक्ति होती है सर्वप्रथम उस बछिया की मुक्ति होगी जो गाय के स्तनों से सीधे ही दूध पीती है । राम-नाम का स्मरण न करके क्वाथ = काढा पिया और अंग पर कपड़े नहीं पहने (क्वाथ का अर्थ शीघ्र दौड़ना भी है । हिरण शीघ्र दौड़ता है तथा वस्त्र नहीं पहनता है । उल्टे उसी की खाल को संत महात्मा कमर में कटिवस्त्र के रूप में पहनते हैं) ।
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यदि शीघ्र दौड़ने = तीर्थ यात्रा करने से तथा वस्त्र न पहनने से ही बैकुंठ की प्राप्ति होती हो तो मृग बेचारा मृग हुआ क्यों दौड़ता फिरता है । क्यों नहीं उसकी मुक्ति हो जाती । हे मन ! हे जीव ! ! रामनाम ही तारता है । रामनाम के स्मरण करने से ही जीव तिरता है । अतः राम-नाम-स्मरण के अतिरिक्त अन्य किसी और साधन का आश्रय मत ले ।
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बषनांजी कहते हैं कि मेरी बातों का कोई बुरा मन मानों । यदि किसी को मेरी बातें कड़वी लगें तो उसे चाहिये कि वह गीता को पढ़े । अर्थात् मैंने जो बातें ऊपर कहीं हैं वे मनगढंत नहीं है । उनका समर्थन गीता करती है ॥८५॥
“अशास्त्रविहितं घोरं तप्यंते ये तपो जनाः ।
दम्भाहंकारसंयुक्ता कामरागबलान्विताः ॥
कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्रामचेतसः ।
मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्धयासुरनिश्चयान् ॥” गीता १७/५-६॥

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