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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
आचार्य पर्व -
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नारायणा दादूधाम में पहुँच कर सब संतों से परामर्श किया । तब यह प्रश्न आया कि गद्दी पर किसको बैठाया जाय ? फिर समाज के माने हुये संतों को बुलाया । सबके आ जाने पर सबने निश्चय किया कि दादूजी महाराज ही उत्तराधिकारी का निर्णय देगें, उन्हीं से प्रार्थना की वह सब आचार्य जैतरामजी महाराज के गद्दी पर विराजने के प्रसंग अध्याय तीन में लिख दिया गया है । वहाँ देखें ।
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दादूजी महाराज ने लघु जैत की आज्ञा नभवाणी द्वारा दी । फिर उनको गद्दी पर बैठाना निश्चय हो गया । तब ध्यानीबाई सहमत हो गई । गद्दी पर बैठने वालों पर प्रतिबन्ध लगा रखा था उसको हटा दिया । इससे सूचित होता है कि सभाकुमारी जी ने तथा ध्यानी जी ने आचार्य गद्दी पर न बैठकर केवल समाज एक मत होकर एक व्यक्ति को न बैठाये तब तक प्रतिबन्ध लगाये रक्खा था ।
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वे आचार्य होने योग्य व्यक्ति की तथा संपूर्ण समाज की एकता की प्रतिक्षा करती रही थी । जयतरामजीने आचार्य हो गये और वि. सं. १७६० में ध्यानी बाई ब्रह्मलीन हो गई । ध्यानी बाई की गुरु सभाकुमारी वि. सं. १७२४ में ब्रह्मलीन हो गई थी । कहा भी है-
‘‘सत रासे चौबीसिये, चलिया सभाकुमारी ।
चेली सभाकुमारी की, ध्यानी बैठी पाट ।
सतरासे अरु साठ ही, कुमारि चल्या दे हाट ।’’
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दे हाट का तात्पर्य यही ज्ञात होता है कि योग्य आचार्य की व्यवस्था हो जाने पर ध्यानीबाई ने उपदेश के केन्द्र दादूजी की गद्दी पर प्रतिबन्ध लगा रक्खा था । वह गद्दी जैतरामजी को देकर बाईजी की पालका में चली गई और वि. सं. १७६० में ब्रह्मलीन हो गई ।
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५- वि. सं. १८१० में मेडते में आचार्य कृष्णदेव जी महाराज ब्रह्मलीन हुये तब मेडते में तो जोधपुर नरेश, नागौर नरेश आदि मारवाड के सरदारों, भक्तों व उतराधे संतों तथा अन्य थांमायती महन्तों ने मिलकर कृष्णदेव जी की आज्ञानुसार चैनराम जी महाराज को आचार्य पद पर अभिषिक्त किया । किन्तु नागे संत तथा जयपुर नरेश ने मिलकर नारायणा दादूधाम में आचार्य कृष्णदेव जी के दूसरे शिष्य गंगाराम जी को आचार्य गद्दी पर बैठा दिया ।
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किन्तु फिर वि. सं. १८१२ में समाज में एकता हो गई तब गंगाराम जी ने प्रसन्नता से गद्दी त्याग दी थी । वि. सं. १८१० से वि. सं. १८१२ तक गंगाराम जी नारायणा दादूधाम की गद्दी पर विराजे किन्तु संपूर्ण समाज की सम्मति से नहीं विराजने से वे आचार्यों की गणना में नहीं आये । उनके दूसरे गुरु भाई कृपाराम जी को सवाई जयसिंह द्वितीय जयपुर नरेश ने गृहस्थ बना दिया था । वे समाज के भेष भण्डारी बने रहे ।
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अब गंगाराम जी छत्रियों के महन्त जी की परंपरा पाखर ग्राम में है । उनकी परंपरा के संत नारायणा से पाखर चले गये । कृपाराम जी भेष भंडारी जी की परंपरा कैरया ग्राम में है । कैरया नारायणा के पास ही है ।
(क्रमशः)

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