शनिवार, 11 अप्रैल 2026

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ १/४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ १/४*
आज्ञाकारी अंग के अनन्तर गुरु के संयोग और वियोग से होने वाले फलाफल का परिचय देने के लये गुरु संयोग वियोग महात्म्य का अंग कह रहे हैं -
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*सद्गुरु प्रत्यक्ष परसतैं, शिष की शंका जाँहिं ।*
*ज्यों दिनकर१ सौं दिन दरसे, त्यों निशि सूझे नाँहिं ॥१॥*
सद्गुरु के मिलने पर शिष्य की शंका नष्ट हो जाती है, यह प्रत्यक्ष ही है । जैसा सूर्य१ के प्रकाश दिन में दिखता है, वैसा रात्रि में नहीं दिखता । वैसे ही गुरु के संग से ज्ञान होता है, वैसा ज्ञान गुरु के अभाव में नहीं होता ।
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*गुरु चन्दन जीवित मुवौं, वचन वास बिच होय ।*
*नर तरु निपजे परसपर, त्यों पीछे नहिं कोय ॥२॥*
चन्दन मृतकवत सूखे काष्ठों को भी अपनी सुगन्ध द्वारा उन्हें सुगन्धित करना रूप जीवन देता है । वैसे ही गुरु ज्ञानहीन नरों को भी अपने वचनों द्वारा ज्ञानयुक्त करता है । सुगन्ध द्वारा चन्दन और काष्ठ परस्पर मिलते हैं तब चन्दन बनते हैं । गुरु वचनों द्वारा गुरु और नर परस्पर मिलते हैं तब नर ज्ञानी बनते हैं । चन्दन और गुरु के अभाव में उक्त कार्य सिद्ध नहीं हो सकता ।
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*शब्द डंक गुरु भृंग पर, मारत तन में जंत१ ।*
*उभय उतर्यों उभय अंग, सु कला न कंटक२ मंत३ ॥३॥*
शब्द गुरु के पास हो और डंक भृंग के पास हो तब ही गुरु शिष्य के शब्द मारता है और भृंग कीट१ के डंक मारता है । शब्द गुरु से हट जाय तथा डंक भृंग से हट जाय, तो इन दोनों के हट जाने से शिष्य और कीट में परिवर्तन रूप सुन्दर कला प्रकट नहीं होगी । उस उद्योग में विध्न२ ही समझो३ ।
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*गुरु हमाइ१ संयोग शब्द पर, परस्यूं पलटे प्राण ।*
*रज्जब बिछड्यूं बल घटे, समझै संत सुजाण ॥४॥*
हुमा१ पक्षी की छाया के संयोग से प्राणी दरिद्री से बदलकर राजा हो जाता है और गुरु के शब्द संयोग से साधारण मानव से बदलकर संत हो जाता है । हुमा और गुरु के संयोग बिना उनका वर्तमान बल भी घटता जाता है किन्तु इस रहस्य को कोई विरले बुद्धिमान संत ही समझ पाते हैं ।
(क्रमशः)

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