शुक्रवार, 3 अप्रैल 2026

*८.आज्ञाकारी का अंग ~ ३२/३४*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*८.आज्ञाकारी का अंग ~ ३२/३४*
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*गुरु आज्ञा दुनिया तजहु, आज्ञा दर्शन त्याग ।*
*रज्जब आज्ञा ऐन यहु, पाखंड प्रपंच से भाग ॥३२॥*
गुरु आज्ञानुसार सांसारिक राग को त्यागो, जोगी, जंगम, सेवडे, सन्यासी, बौद्ध और शेखों के भेष तथा मताग्रह को त्यागो । पाखंड प्रपंच से दूर भागो, यही गुरु की यथार्थ आज्ञा है ।
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*शिष्य सदा सत शब्द मधि१, गुरु थिर गोविंद माँहिं ।*
*उभय उमर ठाहर व्यतीत, तब सँचर२ कछु नाँहिं ॥३३॥*
३३ में गुरु-शिष्य की निर्दोषता दिखा रहे हैं - शिष्य सदा गुरु के यथार्थत शब्दों में१ मन लगाये रहता है और गुरु गोविन्द के चिन्तन में मन स्थिर रखता है । इस प्रकार दोनों की आयु उक्त “शब्द मनन” और “गोविन्द भजन” रूप दोनों स्थानों में ही व्यतीत होती है, तब उनमें कोई दोष२ नहीं रहता वे निर्दोष ही हैं ।
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*शिष सोई सत सीख में, गुरु सोई ज्ञान गरक्क१ ।*
*मन वच कर्म रज्जब कहै, युगल२ जु पावैं जक्क३ ॥३४॥*
३४ में योग्य गुरु-शिष्य का परिचय दे रहे हैं - जो यथार्थ शिक्षानुसार चलता है वही शिष्य है और जो ज्ञान में निमग्न१ रहता है वही गुरु है । हम मन, वचन और कर्म से यथार्थ ही कहते हैं, उक्त प्रकार के गुरु-शिष्य दोनों२ ही शांति३ को प्राप्त होते हैं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित “८. आज्ञाकारी का अंग” समाप्त ॥
(क्रमशः)

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