🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू दह दिश दीपक तेज के, बिन बाती बिन तेल ।*
*चहुँ दिसि सूरज देखिये, दादू अद्भुत खेल ॥*
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*ब्रह्मविचार ॥*
एता ही मैं जाणीलै । पूरण ब्रहम बखाणीलै ॥टेक॥
अबिनासी दीपक बिन थालै । तेल जलै न बाती न्हालै ॥
अगनी होइ न मँदिर प्रजालै । सब सूझै तिहि कै उजियालै ॥
करमादिक दीपक जे कीजै । तेल जलै बाती पणि छीजै ॥
जीव दगध जे पड़ै पतंगा । आदि अंति दीपक कौ भंगा ॥
रे पारिख क्यूँह पारिख कीजै । खोटा रालि खरा नित लीजै ॥
रालि आरसी तवै दिखालौ । जैठै लागौ तंहिठै कालौ ॥
बुझिये दिवै न होइ उजियालौ । गलथनिया मैं दूध दिखालौ ॥
बषनौं कहै सुनौं रे लोई । परिख करैगा बिरला कोई ॥१०६॥
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आगे एक पंक्ति में जितना सा कहा जा रहा है; बस, उतने में ही पूर्णब्रह्म परमात्मा को जानले और उसका अहर्निश बखान = स्मरण कर ले । अविनाशी ब्रह्न रूपी दीपक थालै = किसी स्थान विशेष में जलकर वहीं प्रकाश नहीं करता । वह तो देश, काल और वस्तु के परिच्छेद से सर्वथा अन्वछिन्न है .....
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“दिक्कालाद्यन्वच्छिन्नानन्तचिन्मात्रमूर्तये ।
स्वानुभूत्येकमानाय नमः शांताय तेजसे ॥”
वह सर्वत्र प्रकाशित होता है । (अर्थात् परमात्मा ब्रह्माण्ड के जर्रे जर्रे में व्याप्त है) उस ब्रह्म रूपी दीपक में न तैल जलता है और बत्ती ही दिखाई देती है ।
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(माया विद्या और अविद्या के नाम से दो प्रकार की है । अथवा माया तथा अविद्या नाम से दो प्रकार की है । अथवा माया तथा अविद्या नाम से दो प्रकार की है । सत्वप्रधान माया तथा रज-तम प्रधान अविद्या होती है । माया ईश्वर की उपाधि है जबकि अविद्या जीव की उपाधि है । ब्रह्म इन दोनों से अतीत है । यही दीपक का बिना तैल तथा बाती के जलना है ।)
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उस दीपक के जलने से न अग्नि = ताप ही उत्पन्न होती है और न मंदिर ही उससे जलता है । फिर भी उसके प्रकाश से सब कुछ दिखाई देता है । (वह निर्गुण-निराकार-परमात्मा अकर्ता है फिर भी सारी सृष्टि का उत्पादन उसी से होता है क्योंकि वह जगत का अभिन्ननिमित्तोपादन कारण कहा जाता है । सारी सृष्टि का उत्पादन, संचालन, नियंत्रण करने के उपरांत भी वह उसमें लिपता नहीं है । यही दीपक के जलने पर भी न अग्नि का उत्पन्न होना तथा न मंदिर का जलना है ।) इसके विपरीत करमादिक = अवतार धारण करके कर्म करने वाले अवतारी भगवान का दीपक बनाते हो तो उस दीपक का तैल भी जलता है तथा बत्ती भी छीजती है ।
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(सगुण परमात्मा को भी कर्मों का बदला चुकाना पड़ता है । यथा बाली ने रामावतार का बदला कृष्णावतार में व्याध बनकर लिया तथा इनको अंत में शरीर त्यागकर अथवा शरीर सहित इस जगत् से जाना भी पड़ता है । यही सगुण परमात्मा रूपी दीपक की बत्ती का छीजना तथा तैल का जलना है) जो भी जीव रूपी पतंगे सगुण परमात्मा की साधना रूपी लौ पर आसक्त होकर गिरते हैं उनका नाश अवश्यम्भावी होता है ।
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(सगुणोपासक मोच्छ न लेही ॥ मोक्ष न मिलना ही नाश होना है ।) क्योंकि सगुण-परमात्मा रूपी दीपक का आदि होकर एक दिन अंत भी होता है । बषनांजी कहते हैं, अरे परीक्षक ! कुछ तो परीक्षा करके सत्य को जानने का प्रयत्न कर । खोटा रूपी सगुण-परमात्मा को रालि = त्यागकर खरा = निष्कलंक-निर्गुण-निराकार-परमात्मा को अंगीकार कर । यदि तू आरसी = दर्पण रूपी निर्गुण-निराकार-परमात्मा को त्याग कर काले तवे रूप सगुण परमात्मा को अंगीकृत करेगा तो जिस जगह उस तवे को लगायेगा, वहीं वह तुझे काला कर देगा ।
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बुझे हुए दीपक से उजाला नहीं होता । जो अवतारी परमात्मा यहाँ से चला गया उससे मुक्ति की आशा करना ठीक वैसे ही व्यर्थ है जैसे बकरी के गले के थनों से दूध प्राप्ति की आशा करना । जिस प्रकार गले के थनों में दूध दिखावटी होता है वैसे ही अवतार भगवान दिखावटी परमात्मा है; वास्तविक नहीं । हे लोगों ! सुनो; बषनां डंके की चोट से कहता है, नित्य-अनित्य, असली-नकली परमात्मा की परीक्षा विरला ही करता है । हरेक के वश की बात नहीं है ॥१०६॥

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