गुरुवार, 30 अप्रैल 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग १३/१६

 

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग १३/१६
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सुन्दर तूं न्यारौ सदा, क्यौं इंद्रिनि संग जाइ । 
ये तो तेरी शक्ति करि, बरतैं नाना भाइ ॥१३॥
अरे भाई ! तूं तो इन सब(इन्द्रियों) से पृथक् है, फिर इन के साथ तूं क्यों भ्रान्त हो रहा है ! यह बात तेरी समझ में क्यों नहीं आती कि तूं इन का सञ्चालक है अतः ये सब तेरे अधीन हैं, तेरे ही आश्रय से ये अपना समस्त व्यापार कर पाती हैं ॥१३॥
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सुन्दर मन कौं मन कहै, बहुरि बुद्धि कौं बुद्धि । 
तोहि आपने रूप की, भूलि गई सब सुद्धि ॥१४॥
तूं इस देहस्थ मन को अपना मान रहा है, इस देह में स्थित बुद्धि को भी अपना मान रहा है । क्या तुझे स्व रूप की दशा(स्मृति) पूर्णतः विस्मृत हो चुकी है ॥१४॥ 
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कहै चित्त कौं चित्त पुनि, सुन्दर तोहि बखानि । 
अहंकार कौं है अहं, जानि सकै तो जानि ॥१५॥
तूं इस देहस्थ चित्त को भी अपना मान बैठा है और इसके अहङ्कार में अपना ममत्व कर रहा है । यह तेरा कितना विशाल प्रमाद है – इस बात को तूं अब भी जान सके तो जान ले ॥१५॥ 
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सुन्दर श्रवणनि कौ श्रवण, आहि नैंन कौं नैंन । 
नासा कौं नासा कहै, अरु बैननि कौ बैंन ॥१६॥
तूं इन स्वदेहस्थ श्रवण, नेत्र, नासिका एवं रसना - इन्द्रियों को अपना मान कर इन में स्वत्व कर बैठा है । परन्तु वस्तुतः तूं ही इनका वास्तविक श्रवण, नेत्र, नासिका एवं रसना है । तेरे सहारे से ही ये अपना व्यापार कर पाती हैं ॥१६॥
(क्रमशः)

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