शनिवार, 18 अप्रैल 2026

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५३/५६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~५३/५६*
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*रज्जब शब्द समुद्र मधि, मत१ मुक्ता निज ठौर ।*
*सो गुरु मरजीवे बिना, आनि२ न सकई और ॥५३॥*
समुद्र में मोती अपने स्थान पर है, उसे मरजीवा बिना अन्य कोई भी नहीं ला सकता । वैसे ही शब्दों में विचार हैं किन्तु उसे गुरु बिना अन्य कोई भी नहीं निकाल सकता, गुरु ही निकाल कर शिष्यों को प्रदान करते हैं ।
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*रज्जब शाल१ ताला जङ्या, अर्थ द्रव्य धर माँहिं ।*
*सु गुरु दृष्टि कूंची बिना, हस्त सु आवे नाँहिं ॥५४॥*
शब्द रूप घर१ में अर्थ रूप धन रखकर, अज्ञान रूप ताला लगा दिया है, यह सद्गुरु की युक्ति-युक्त ज्ञान-दृष्टि रूप ताली के बिना अन्त:करण रूप हाथ में नहीं आ सकता ।
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*वायक१ बादल अर्थ जल, गुरु आज्ञा सु निकास ।*
*बिना संयोग वर्षा बिना, चेले चकहु२ निरास ॥५५॥*
बदलों में जल है किन्तु वर्षा के योग बिना खेती२ को नहीं मिलता । वैसे ही शब्दों१ में ज्ञान रूप अर्थ है, किन्तु वह गुरु आज्ञा से ही निकलता है, बिना गुरु संयोग के शिष्य शब्दों से निराश हुये - से ही रहते हैं ।
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*महापुरुष पारस परसि, पलटहिं प्राण सु धात ।*
*मिलतौं मंगल मौन में, रज्जब तहाँ न बात ॥५६॥*
पारस से लोह धातु मिलती है तब तत्काल स्वर्ण रूप में बदल जाती है । वैसे ही महापुरुष से प्राणी मिलता है तब मौन में अखण्ड शांति रूप मंगल होता है, और वहाँ ब्रह्म भिन्न सांसारिक बात नहीं होती ।
(क्रमशः)

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