🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*फूटी काया जाजरी, नव ठाहर काणी ।*
*तामें दादू क्यों रहै, जीव सरीषा पाणी ॥*
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राग मारू ॥५॥ भ्रमविध्वंश ॥
वा रस रीति न जाणैं कोई, जिहि बिधि हरि की सेवा होई ॥टेक॥
षटक्रम ध्रम ब्रत पूजा पाणी । तामैं पिरथी सकल भुलाणी ॥
जल भरि कुंभ जहाँ थैं ल्याये । मच्छ कच्छ ता भीतरि ब्याये ॥
अंग पखाल्या सौंज षट्याई । मैल रह्या तहाँ खबरि न पाई ॥
चौका चौकि ढोलि जब दीया । जिव का घात घणाँ ही कीया ॥
तुलसी तोड़ी तब जिव मूवा । सुची करी फिरि सूतिग हूवा ॥
ब्रह्म बिचालै दुबिधा होई । पाक कियाँ जिनि भींटै कोई ॥
खाइ नहीं तिहि आगै मेल्है । आतमराम अपूठा ठेलै ॥
ब्रह्म बिरोध्या पाथर पूजै । च्यार् यूँ फूटी तौ क्या सूझै ॥
अपणैं अपणैं चौकै चाढ्या । घर का माणस बाहरि काढ्या ।
पीछैं पांडे कार बुझाणैं । चाड हुई तब घर मैं आणैं ॥
वा रस रीति कोइ यक जाणैं । जिहिं सेवा साहिब भल मानैं ॥
कनक कलस हरि जल भरि लीजै । तिरबैणी तहाँ मंजन कीजै ॥
बुझणि न जाइ घटै नहिं बाढै । निरमल तिलक तहाँ लै काढै ॥
चित चौका दे सेवा साजै । तिहि घर केवल राम बिराजै ॥
संख सबद भरि भरि हरि दाखै । इहिं बिधि चरणाँ अंम्रत चाखै ।
लोभ मोह मद मच्छर बाढै । पहली बार इन्हाँ बिचि काढै ॥
भाव भगति करि भोग लगावै । सो परसाद सही हरि पावै ।
बषनां बात जवै ह्वै लेखै । पूरणब्रह्म सकल मैं देखै ॥९३॥
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षटकर्म = हठयोगानुसारी छः क्रियाएँ नैति, धौती आदि अथवा ब्राह्मणों द्वारा पालनीय षटकर्म पढ़ना-पढ़ाना, दान देना, दान लेना आदि । ध्रम = दान-पुण्य । ब्रत = उपवास । पाणी = तीर्थस्थान । सौंज = सामगी । षट्याई = विन्यास = शरीर पर नाना तरह के कपड़े पहने तथा केशादि को सँवारा ।
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ढोलि = जब चौका लगाया, कच्चे घरों में गोबर-मिट्टी से, भोजन बनाने के पूर्व चौके को लीपा जाता था । पीली मिट्टी से चौका लगाते हुए मैंने बचपन में मेरी दादी माँ व माँ को पक्की रसोईघर में भी देखा है । बिचालै = बीच में ॥ भींटै = स्पर्श करे । अपूठा ठेलै = उल्टा ही भगा देते हैं । बिरोध्या = विरोध करने वाले । च्यार् यूँ = दो आँखें प्रत्यक्ष तथा दो अंतःकरण की विवेक एवं विचार ।
“हाकम नैं संग्राम कहै तू आंधौ मति होइ यार ।
दो दो नेतर सबनि कैं तेरै चहिये चार ॥
तेरैं चहिये चार दोइ देखण कूँ बारै ।
दोइ हिया कै मांहि जकाँ सूँ न्याव निहारै ॥
जस अपजस रहसि अठै समय बार दिन चार ।
हाकम नैं संग्राम कहै तू आंधौ मति होइ यार ॥”
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संग्रामदासजी के कुंडलिया; सम्पादक : ब्रजेन्द्रकुमार सिंहल । सूझै = दीखै । चाढ्या = भोजन बनाना प्रारम्भ किया । कार बुझाणैं = सीमा = प्रतिबन्ध हटाता है । चाड़ = बुलाने की आवाज । कनक कलस = हृदय । हरिजल = परमात्मा के प्रति अनन्य अनुराग । मंजन = स्नान । तिरवेणी = इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना का संगम ।
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बुझणि न जाइ = अनन्य अनुराग समाप्त न हो । घटै नहिं = मंद भी न पड़े । बाढै = अहर्निश बढ़े । चित चौका = चित्त में से समस्त कलुषों को निकालना रूपी चौका लगावे । दाखै = बोलै = स्मरण करे । बाढै = काट दे, निकालकर बाहर कर दे । लेखै = उक्त बातें संपादित सससहों, आचरित हों ।
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जिस विधि से परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा की सेवा होती है उस रस = प्रेममयी भक्ति की रीति को कोई नहीं जानता । पृथिवी की सारी ही जनता या तो नेति-धोती आदि षट्कर्मों को या पुण्य या व्रत-उपवासादि या मूर्ति-पूजा या तीर्थादि में स्नानादि के करने के ही भ्रमों में उलझी पड़ी है । जिन तीर्थों में से कुंभ में भरकर जल लाये हैं क्या वह पवित्र है ? अरे ! उसमें तो कछुवे और मगरमच्छ प्रजनन करते हैं, मल-मूत्र करते हैं और बच्चे पैदा करते हैं । उन्हीं तीर्थों में जाकर शरीर को नहलाते हैं, फिर उसका(शरीर का) तिलकादि लगाकर, केश विन्यास करके श्रृंगार करते हैं किन्तु जिस मन में मैल = पापादि रहते हैं उसके बारे में तनिक भी विचार नहीं करते हैं ।
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जब चौके को पवित्र करने केलिए गोबर-मिट्टी से लीपते-पोतते हिं तब बहुत से छोटे-छोटे जीवों को मारने की हत्या करते हैं । भोग लगाने के लिये जब तुलसी तोड़ते हैं तब भी जीव करते हैं । जब उस तुलसी को जल से धोकर पवित्र करते हैं, तब भी जीव मरते हैं । जब उस तुलसी को जल से धोकर पवित्र करते हैं, तब भी जीव हिंसा होती है(सूतिग = अस्पृश्यता = हिंसा) ब्रह्म = भगवान् और भक्त के बीच में दूरी(दुविधा) हो जाती है क्योंकि पुजारी कहता है, अब आप इसके हाथ तक मत लगाओ क्योंकि इसे पवित्र कर लिया गया है ।
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जो परमात्मा की मूर्ति भोजन खाती नहीं उसके आगे तो भोग धरते हैं जबकि जिस भिखारी के शरीर में आत्मा रूपी परमात्मा विराजमान है उसे बिना भोजन कराये ही उल्टा भेज देते । परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का विरोध करते हैं जबकि पत्थर को भगवान् मानकर पूजते हैं । क्योंकि इन मूर्खों की चारों ही आँखें फूट गई होती हैं । इन्हें सत्यानृत क भेद ही मालूम नहीं पड़ता ।
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अपने-अपने चौकों में जब भोजन बनाने की तैयारी की जाती है तब उस घर में से(रसोईघर में से) घर के अन्य सभी मनुष्यों को बाहर निकाल दिया जाता है । फिर पांडे(पंडित, आचारी व्यक्ति) भोजन तैयार हो जाने पर सबको आने के लिये आवाज लगाता है । अपनी कार को मिटाता है तब सब लोग घर में प्रविष्ट होते हैं ।
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वस्तुतः परमात्मा जिस सेवा विधि से प्रसन्न होता है उस अनुरागमयी रीति को कोई कोई ही जानता है ।
“मनुष्याणां सहस्त्रेषु कश्चिद्यतति सिद्धये ।
यततामपि सिद्धानां कश्चिन्मां वेत्ति तत्त्वतः ॥”
परमात्मा को प्रसन्न करने की वास्तविक सेवाविधि तो अग्रांकित प्रकार से है । हृदय रूपी कनक कलश में परमात्मनाम में अनन्य प्रीति रूपी जल भरे । फिर उस राम नाम का अखंड जप करे तथा त्रिवेणी घाट पर पहुँचकर उसमें स्नान करे = सरोवर हो जाये । ऐसा प्रयत्न करे कि यह रामनाम का स्मरण छूटे तो बिलकुल ही नहीं, कम भी न हो उल्टे दिनानुदिन बढ़ता ही जाये(प्रतिक्षणवर्धमानं, नारदभक्तिसूत्र) फिर स्नानोपरान्त वहाँ निर्मल तिलक लगावे ।
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चित्त में से सारे कलुषों को निकालने रूपी चौका लगावे और अहर्निश अनन्य अनुरागयुक्त राम-नाम का स्मरण करे । जो इस प्रकार से अपने घर रूपी घट को परमात्मा के लिये तैयार करता है उसमें निश्चय ही परमात्मा विराजमान होता है । शंख में हरि का नाम भरकर बजावे और उसी रामनाम के जप प्रभाव से स्त्रवित सुषुम्ना के अमृत जलरूपी चरणामृत का पान करे । लोभ, मोह, मद = अभिमान, मात्सर्य = चुगलखोरी को समाप्त करे ।
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सर्वप्रथम ही इन्हें अंतःकरण में न आने देने के लिये बाड़(कार = सीमा = बाड़) लगावे । भावभक्ति का भोग लगावे । इस भावभक्ति रूपी प्रसाद को ही परमात्मा ग्रहण करता है ।
“न देवो विद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
भावो हि विद्यते देवो तस्माद् भावो हि कारणं ॥”
बषनांजी कहते हैं, जब उक्त प्रकार से सारी सामग्री तैयार हो जाये = साधना हो जाये तब सचराचर में ही परमात्मा के दर्शन होना प्रारम्भ हो जाता है ॥९३॥

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