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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२२. आपने भाव को अंग २३/२५
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सुन्दर अपने भाव तें, रूप चतुर्भुज होइ ।
याकौं ऐसौई दृसै, वाकै रूप न कोइ ॥२३॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - अर्जुन के अपने हृद्गत विचार(भाव) के कारण ही कृष्ण उसको सदा चतुर्भुज रूप में दिखायी देते थे । यद्यपि उन का रूप चतुर्भुज नहीं था । भगवान् तो नीरूप(रूप -रहित) होते हैं । भक्त अर्जुन के भक्तिपूर्ण आग्रह के कारण ही उनको उसके सामने सदा चतुर्भुज रूप में ही आना पड़ता था२ ॥२३॥ २ द्र० - श्रीमद्भगवद्गीता : तेनैव रूपेण चतुर्भुजेन, सहस्रबाहो भव विश्वमूर्ते ! ॥ (अ० ११, श्लोक ४६))
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काहू मान्यौ सींग सौ, हृदये उपज्यौ चाव ।
सुन्दर तैसौ ई भयौ, जाकै जैसौ भाव ॥२४॥
भक्त प्रह्लाद को भगवान् के सिंह रूप से भी प्रीति थी । उसने उसी रूप के माध्यम से उन प्रभु की भक्ति की थी । अतः वे उसी(नृसिंह) रूप में प्रकट हुए । क्योंकि भगवान् भक्त के भाव के अधीन हैं; अतः वह भक्त जैसा रूप चाहता है उसी रूप में वे उसके सम्मुख आते हैं३ ॥२४॥ (३ भक्त प्रह्लाद की कथा भागवत पुराण में प्रसिद्ध है ।)
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काहू सौं अति निकट है, काहू सौं अति दूरि ।
सुन्दर अपनौ भाव है, जहां तहां भरपूरि ॥२५॥
इति आपने भाव को अंग ॥२२॥
इसी भाव – भेद के कारण वे प्रभु व्यवहार में किसी भक्त के बहुत समीप दिखायी देते हैं, किसी से बहुत दूर । श्रसुन्दरदासजी कहते हैं - प्रत्येक भक्त के भाव की विचित्रता के कारण ही यह सब होता है; अन्यथा भगवान् तो सर्वव्यापक हैं, उन पर अतिसमीप या अतिदूर रहने का उपालम्भ नहीं लगाया जा सकता ॥२५॥
इति आपने भाव का अंग सम्पूर्ण ॥२२॥
(क्रमशः)

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