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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६ -
आचार्य पर्व -
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६- आचार्य दिलेरामजी महाराज ने वि. सं. १८९४ में अपने ज्येष्ठ शिष्य भजनानन्दी, परमविरक्त, बाल ब्रह्मचारी जो नवलगढ अग्रवाल वैश्य भक्त परिवार में जन्में थे, उनका पिता दादूजी का परम भक्त था । उसने अपने पुत्र रामबगस को आचार्य दिलेरामजी के भेंट कर दिया था । रामबगस जी की भजन निष्ठा, विरक्ति, समता, मितभाषिता परम संतोष आदि विशेषताओं को देखकर आचार्य पद के योग्य रामबगस जी को निश्चय किया ।
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वि. सं. १८९४ में रामबगसजी को उनकी इच्छा नहीं होने पर भी आचार्य दिलेरामजी ने अपना उत्तराधिकारी नियत करके भेष में पूजा बांट दी । इससे आचार्य दिलेरामजी के ब्रह्मलीन होने पर आचार्य दिलेरामजी की आज्ञानुसार समाज ने रामबगस जी की इच्छा न होने पर भी आचार्य पद पर अभिषिक्त कर दिया ।
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किन्तु रामबगसजी को यह वैभव संपन्न पद रुचिकर नहीं हुआ । वे इसको त्यागकर भागने का ही विचार प्रतिपल करते रहते थे । उन को उनके आचार्य काल के १७ दिन १७ वर्ष से भी अति महान् निकले थे । १८ वें दिन की रात्रि को उन्होंने भागने का दॄढ निश्चय कर लिया था ।
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आज वे रात्रि को चैनरामजी महाराज की बारहदरी के पूर्वी चौबारे में थे । उसकी दक्षिण की खिडकी से रस्सा डालकर नीचे उतर गये और रात ही रात में बहुत दूर निकल गये तथा परिचित लोगों से बचते हुये दूर देश में चले गये और वर्षों तक तीर्थयात्रा में भ्रमण करते रहे ।
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इधर इनकी आशा छोडकर इनके छोटे गुरु भाई प्रेमदासजी को समाज ने आचार्य पद पर अभिषिक्त कर दिया । फिर रामबगसजी चिरकाल से विचरते हुये इधर आये और हरमाडा ग्राम में स्थायी रुप से रहने लगे । हरमाडे ग्राम के बीच में जो दादूद्वारा अस्थल है वह आपका ही है । आपने केवल १७ दिन ही आचार्य गद्दी पर अति कठिनता से निकाले थे ।
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अत: अल्पकाल रहने से इनको भी आचार्यों की गणना में नहीं गिना गया । यही आचार्य प्रणाली की कुछ घटनायें शेष रह गई थीं । जैसी ग्रंथों में देखी गयी थी तथा वृद्ध संतों से परंपरागत सुनी गई थी, सो यहाँ लिख दी गई हैं । जिससे नाना भ्रांतियों को अवकाश नहीं मिल सकेगा ।
(क्रमशः)

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