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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २९/३२
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ज्यौं मनि कोऊ कंठ की, भ्रम तैं पावै नांहिं ।
पूछत डोलै और कौं, सुन्दर आपुहि मांहिं ॥२९॥
जैसे किसी जडमति(अज्ञ) को अपने कण्ठ में पहनी हुई माला के विषय में भ्रम हो जाय कि उसके गले में माला नहीं है और वह दूसरों से उस माला के विषय में पूछने लगे । वही स्थिति देहाध्यास के कारण इस आत्मा की भी हो गयी है ॥२९॥
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सुन्दर चेतनि आपु यह, चालत जड की चाल ।
ज्यौं लकरी के अश्व चढि, कूदत डोलै बाल ॥३०॥
महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि देहाध्यास के कारण यह आत्मा ऐसी चेष्टाएँ कर रहा है मानो कोई बालक काठ के घोड़े पर चढकर उछल कूद मचा रहा हो ! ॥३०॥
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भूतनि मांहें मिल रह्यौ, तातें हूवौ भूत ।
सुन्दर भूलौ आपु कौ, उरझ्यौ नौ मण सूत ॥३१॥
यह पाँच महाभूतों(से सम्पृक्त देह) में मिल गया(अध्यास कर लिया) है अतः यह भी भूत बन गया है । इसलिये इस के सम्मुख भी नौ मन सूत के सुलझाने जैसी कठिन समस्या खड़ी हो गयी; क्यों कि नौ मन सूत को कोई सावधान चित्त वाला, धैर्यवान् एवं विवेकी पुरुष ही सुलझा सकता है१ ॥३१॥
{१ तु० - श्रीदादूवाणी : जीव जंजालौं पड़ि गया, उलझ्या नौ मण सूत ।
कौ इक सुलझै सावधान, गुरु बाइक औधूत ॥ (१/८३)}
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आपुहि इंद्री प्रेरि कै, आपुहि मांनै सुक्ख ।
सुन्दर जब संकट परै, आपु हि पावै दुक्ख ॥३२॥
उस देहाध्यास का दुःखद परिणाम यह होता है आत्मा स्वयं को इन्द्रियों का प्रेरक मानकर उन के विषय-सम्पर्क से होने वाले सुख को अपना सुख मानने लगता है; परन्तु जब कभी विषम स्थिति आने पर उन से उद्भूत दुःख से इस का सामना होता है तो यह स्वयं को दुःखी मानने लगता है ॥३२॥
(क्रमशः)

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