🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*ऐसो राजा सेऊँ ताहि,*
*और अनेक सब लागे जाहि ॥*
*तीन लोक ग्रह धरे रचाइ,*
*चंद सूर दोऊ दीपक लाइ ।*
*पवन बुहारे गृह आँगणां,*
*छप्पन कोटि जल जाके घरां ॥*
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*विचार, ब्रह्मस्वरूप ॥*
वो घर वोलगी उलगाणौं ।
जिहिं धू प्रहिलाद निवाजियौ,बैंकुंठ तणौं दियौ थाणौं ॥टेक॥
जिहिं घरि नींव घणेरी, औरां थैं अधिकेरी ।
जिहिं थंभ खंभ नहिं लाया, बिन थंभा गगन छाया ॥
जाकै दीपक चंद र सूरा, वो तेज सरूपी पूरा ।
वाकी जोति अलेषै, संसार सबाया देखै ॥
भरिया भरपूर भँडारा, तहाँ लक्षमी अनँत अपारा ।
चारि पदारथ सारा, तिहि घरि नित प्रति जैजैकारा ॥
जाकै रिधि सिधि दोऊ दासी । आप तहाँ अबिनासी ।
जहाँ नारद सारद गावैं । वहिं घरि अनहद बेणि बजावैं ॥
जाकै बैकुंठ सी चित्रसाली, सुख सेज्याँ बनमाली ।
कलपब्रिच्छ की छाया, तहाँ मोह न ब्यापै माया ॥
जहाँ लिपै पुन्नि न पापै, वो करम सबाया कापै ।
मुकति वोलग्याँ आपै, करि आप सरीखा थापै ॥
जाकै अठार भार बनमाला, गुणचास कोटि धरचाला ।
पर्वत मेर सुमेरा, तिहिं घरि बाव बरण बहुतेरा ॥
जाकै सात समद बिन थाघा, वो कार न लोपै आघा ।
छ्यानवैं कोटि मेघ माला, सब उहिं घरि पाणी वाला ॥
जाकै ब्रह्मा बिष्न महेसा, सुर नर संकर सेसा ।
तेतीस कोड़ि देव दाणा, सब उहिं घर का उलिगाणा ॥
जाकै तीनि लोकि बिस्तारा, सारूँ का पूरणहारा ।
जिव जंत सब राया, सब उहि घरि पलता आया ॥
जाकै नख सुरसरी धारा, जाकै अंत न आवै पारा ।
चारि बेद मुखि बाणी, जाकी गति जाइ न जाणी ॥
जाकै भींव भींछ हणवंता, अैसे जोधा बहुत अनंता ॥
धरमराइ पड़दारा, द्वारै चित्र बिचित्र लेखारा ॥
जाकै सुषदेव जैदेवा, करै भाव की सेवा ।
अंमरीक हितकारी, जिनि द्रौप अहल्या तारी ॥
जाकै नामाँ सेन कबीरा, पीपा धनाँ अहीरा ।
सूरदास रैदासा, सगलाँ की पूरै आसा ॥
जाकै दत गोरख स्यौ आदू, गोपीचँद भरथरि दादू ।
सोझा बीझल हरिदासा, जन नानक चरन निवासा ॥
जाकै भगत सिरोमणि सारा, तहाँ दीसै दै दै कारा ।
सब मांहीं राम बिराजै, तिहिं घरि सदा बधावा बाजै ॥
जिहिं घरि बतरणि ऐति, सो जाणी जाइ न केती ।
सस सहस मुख गावै, ते भी पार न पावै ॥
सो अनतालोक कौ राजा, घणहर सा बाजैं बाजा ।
अबिनासी राजा कहिये, बषनां तिहिं घरि ओलग रहिये ॥९६॥
वह घर = परमात्मा का घर, वोलगी = प्रवासियों तथा उलगाणौं = प्रवासी परमात्मा का है । (संसार में रहने वाले लोग संसार के अतिरिक्त अन्यत्र रहने वालों को दूर देश का निवासी न कहें तो और क्या कहें । परमात्मा के भक्त शरीर त्यागकर परमात्मस्वरूप होकर परमात्मा के सानिध्य में ही रहते हैं । अतः वे भी परदेशी = दूर देश के निवासी ही हैं । परमात्मा और उसके भक्त दोनों एक रूप हैं । उनमें भेद लेशमात्र भी नहीं है ।)
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वह दूर देश वासी परमात्मा वही है जिसने ध्रुव और प्रह्लाद पर निवाजियौ = कृपा करके उन्हें वैकुण्ठ में निवास प्रदान किया । उस परमात्मा की नींव अत्यन्त गहरी है । अन्य देवी-देवों से अधिक गहरी, मजबूत और प्रभावशाली है । वह परमात्मा सर्वोच्च = उस जैसा वो ही है क्योंकि उसको सहारा देने वाली खंभ, स्तंभ रूपी कोई भी और दूसरी शक्ति नहीं है । उसको बनाने वाला और दूसरी कोई नहीं है । वह बिना किसी स्तंभ-सहारे के सबका सहारा बनकर सर्वोच्च स्थान(गगन) में अवस्थित है ।
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उस परमात्मा के यहाँ चन्द्रमा और सूर्य दीपक = प्रकाश करने का काम करते हैं । ये दोनों उस स्वयंप्रकाशी पूर्ण तेजपुंज परमात्मा से ही प्रकाश प्राप्त करके प्रकाश करते हैं । उस परमात्मा की ज्योति अलक्ष्य है = समग्रतः उसको कोई नहीं देख सकता किन्तु वह सबको देखता है । उसके यहाँ अन्नादि के भरपूर भण्डार भरे हैं । लक्ष्मी = धन-सम्पत्ति अनंत अपार है ।
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चारों पदारथ अर्थ, धर्म, काम मोक्ष, सम्पूर्णतः उसके यहाँ विराजमान हैं । उसके यहाँ सदैव जय जयकार की ही ध्वनि होती रहती है । चारों पदारथों के भरपूर मात्रा में होने से वहाँ कभी कोई कमी होती ही नहीं है जिससे सदैव जैजैकार = आनंद ही आनंद है । रिद्धि = धन-सम्पत्ति, सिद्धि = सदैव बढ़ती है, घटती नहीं है । ऐसी रिद्धि-सिद्धि उसके यहाँ दासी हैं आप स्वयं अविनाशी परमात्मा राजा हैं ।
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उस परमात्मा के यहाँ नारद और शारदा अपनी अपनी वीणाओं को सदैव अनहदनाद = निस्सीम नाद के लिये बजाते रहते हैं । उस परमात्मा के पास निवास करने के लिये वैकुण्ठ जैसा चित्रंशाली = महल है । वनमाला की वहाँ सुखसेज = शय्या है । कल्पवृक्ष की वहाँ छाया है । उस स्थान में माया-मोह का प्रवेश नहीं है । वहाँ रहने वालों पर पाप-पुण्य का प्रभाव नहीं होता । सारे कर्मों को वह तत्काल कापै = काट डालता है । वहाँ पर निवास करने वाले प्रवासियों को वह मुक्ति आपै = प्रदान करता है और उन्हें अपने जैसा बनाकर वहीँ का स्थाई निवासी बना लेता है ।
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उस परमात्मा के यहाँ अठारह भार वनस्पतियों से युक्त वनप्रदेश है । (एक भार में अढाई मण वजन होता है । एक-एक वनस्पति का एक-एक पत्ता एकत्रित करके उन्हें तौला जाये तो उन सबका वजन १८ भार = ४५ मण होता है । यही १८ भार का परिमाण है ।) गुनचास करोड़ योजन वाली भूमि है जिस पर सुमेरु जैसे पर्वत के साथ-साथ अनेकों और भी पर्वत हैं ।
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उस विशाल भूमण्डल में नानावर्णों = प्रकार वाली बाव = वायु है । (वायु भी ४९ प्रकार की ही बताई गई है । गुनचास कोटि मरुद्गण देवता कहे जाते हैं । कोटि=प्रकार ॥ वैसे वायु शीतल, मंद, और सुगंध = तीन प्रकार की होती है ।) उस परमात्मा के यहाँ असीम सात समुद्र हैं । वे अपनी सीमा में ही रहते हैं । अर्थात् उनमें भरा जल, दूध आदि सीमा लांघकर बाहर नहीं आते । उसके यहाँ छियानवे कोटि मेघ हैं । वे सब के सब उसके घर में पानी भरते हैं । अर्थात् समस्त मेघ पृथिवी पर जल वर्षा करते हैं ।
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गुनचास कोटि योजन वाली पृथिवी ही उसका घर है । ब्रह्मा, विष्णु, महेश, तेतीस करोड़ देवता, मनुष्य, शंकर, शेषनाग, तेतीस करोड़ देवता, दानव ये सभी उसी के घर में निवास करते हैं । (उलिगाणा =निवासी) उसका तीनों लोकों में(भूमि, आकाश और पाताल) में निवास है । वह तीनों लोकों में फैला हुआ = समाया हुआ है । तीनों ही लोकों को पूरने वाला=भरण-पोषण करने वाला है । जितने भी जीव-जन्तु हैं वे सभी उसी घर से पालित-पोषित होते आ रहे हैं ।
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जिसके पैर के अंगूठे के नख से सुरसरी=गंगा की धारा का उद्गम हुआ है जिसके जल का अंत नहीं है, आर-पार नहीं है । चारों वेद उसके मुख से निकली हुई उसही की वाणी है जिनका रहस्य जानने में नहीं आता है । जिसके यहाँ भीम, भीष्म, हनुमान जैसे अनेकों योद्धा हैं । पड़दा लगाने हटाने के लिये जिनके यहाँ धर्मराज जैसे व्यक्ति हैं । जिसके घर के द्वार पर विचित्र चित्र चित्रित है । जिसके शुकदेव तथा जयदेव जैसे भावभक्ति युक्त सेवाधारी हैं ।
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उस परमात्मा ने राजर्षि अंबरीष की रक्षा की तथा द्रोपदी तथा अहिल्या का जिसने उद्धार किया । जिसके नामदेव, सेन, कबीर, पीपा, धना, सूरदास, रैदास जैसे भक्त हैं । वह इन सभी की मनोकामनाओं को पूरी करता है । जिसके चरणों में दत्तात्रेय, गोरख आदि शिव, गोपीचन्द, भर्तृहरि, दादू, सोझा, बीझल, हरदास, नानक जैसे भक्तों का निवास है । उसके सभी भक्त शिरोमणि-महान हैं । वहाँ देने की आवाज आती है, लेने की नहीं ।
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वहाँ निवास करने वाले सभी में रामजी विराजते हैं । उसके घर में सदा मंगलाचार ही मंगलाचार के बधावे गाये जाते हैं । वहाँ दुःख का नाम तक नहीं है । जिसके घर का व्यवहार=वैभव उक्त प्रकार का है उसका कैसे वर्णन किया जा सकता है । यदि शेष अपने एक हजार मुखों से भी वर्णन करने लग जाये तो कर नहीं सकता क्योंकि उसकी महिमा का पार नहीं पाया जा सकता । वह परमात्मा अनंत लोकों का राजा है । उसके यहाँ बादलों की गर्जन जैसा बाजा बजता रहता है । वह अविनाशी नाम का राजा है । बस, उसके घर में ही ओलगि=प्रेम-प्रीतियुक्त होकर निवास करना चाहिए ॥९६॥
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