सोमवार, 27 अप्रैल 2026

२४. अथ सांख्य ज्ञान कौ अंग १/४

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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. अथ सांख्य ज्ञान कौ अंग १/४
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सुन्दर सांख्य बिचार करि, संमुझै अपनौ रूप । 
नहिंतर जड के संग तें, बूडत है भव कूप ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी महाराज कहते हैं - साङ्ख्यशास्त्र के अनुसार चिन्तन मनन द्वारा भी आत्मस्वरूप पर विचार करना चाहिये । अन्यथा(नहिंतर) इस अल्पमति जिज्ञासु को, अन्य शास्त्रों के ज्ञाताओं की मूर्खतापूर्ण बातों के जञ्जाल में फँसने से, जन्म मरणपरम्परा से कथमपि मुक्ति नहीं मिलेगी ओर वह उसी में डूबता उतराता रह जायगा ॥१॥
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माया कै गुन जड सबै, आतम चेतनि जानि । 
सुन्दर सांख्य बिचार करि, भिन्न भिन्न पहिचानि ॥२॥
साङ्ख्यशाख के अनुसार, केवल आत्मा ही चेतन है । शेष सभी गुण, प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण, जड(अचेतन) कहलाते हैं । साङ्ख्यशास्त्र का स्वाध्याय करते हुए इन सब को पृथक् पृथक् रूप से समझ(पहचान) लेना चाहिये ॥२॥
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पंच तत्व कौ देह जड, सब गुन मिलि चौबीस । 
सुन्दर चेतनि आतमा, ताहि मिलै पच्चीस ॥३॥
पाँच तत्त्वों से उत्पन्न यह शरीर अचेतन है । इसके उत्पादक गुण, सब मिल कर चौबीस(२४) होते हैं । यदि इन में चेतन आत्मा को भी मिला दिया जाय तो ये ही संख्या में पच्चीस(२५) हो जाते हैं ॥३॥
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छब्बीसवौं सु ब्रह्म है, सुन्दर साक्षी भूत ।
यौं परमातम आतमा, यथा बाप तें पूत ॥४॥
इस उपर्युक्त संख्या में यदि ब्रह्म को भी मिला दिया जाय तो ये सब, सङ्ख्या में, छब्बीस(२६) हो जाते हैं । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - यह साक्षी एवं परमात्मा कहलाता है । इस का(हमारी) आत्मा के साथ वही सम्बन्ध है जो लोक में किसी पिता का अपने पुत्र के साथ होता है ॥४॥
(क्रमशः) 

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