सोमवार, 27 अप्रैल 2026

वोलै ऊबरिबौ हरि थारै

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कहि कहि केते थाके दादू, सुणि सुणि कहु क्या लेइ ।*
*लौंण मिलै गलि पाणियां, ता सम चित यों देइ ॥*
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*शरणागति ॥*
वोलै ऊबरिबौ हरि थारै, कलि की बालि झकोला मारै ॥टेक॥
जप तप करणी दाहै बाली, अलगाँ हीं थै दीसै काली ।
दूधाधारी पवन अहारी, हरि बिन हुई बिगूचनि भारी ॥
नगिन अंगीठी बारहमासा, मोंनी करै मित्र की आसा ।
बनखँडि जाइ गुफा मैं बासा, तीरथ बरत न पूजै आसा ॥
तुम तजि “औरहि वोलै” जांहीं, सो बालि अछूता मेल्ह्या नांहीं ।
जहाँ जाव तहाँ वोलौ नांहीं, झींणी बालि झकोलै मांहीं ॥
वोलै राखि अमर ले कीधा, साषि कहैं ते सरणैं लीधा ।
बषनैं बूझ्या त्याँह समझायौ, ताकि तुम्हारै ओलै आयौ ॥१०३॥
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स्वामी मंगलदासजी ने “औरहि वोलै” का “और हिवालै” पदच्छेद करके “हिवालै” को हिमालय का वाचक माना है किन्तु इसका सही पदच्छेद ऊपर दिया गया है जिससे ही अर्थ की पूर्वापरसंगति पूर्णरूप से बैठती है । “जो तुम को छोड़कर अन्य के आश्रय में जाता है उसको विषय-वासना ने आज तक अपने प्रभाव से अस्पर्श नहीं छोड़ा है ।” अस्तु ।
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कलिकाल में “तामस बहुत रजोगुण थोरा । कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा ।” चारों ओर तामसगुण का साम्राज्य है । फलस्वरूप चारों ओर लड़ाई-झगड़े, वैर-विरोध का प्रभाव है । वैर-विरोध द्वैत बुद्धि के कारण होता है । द्वैत बुद्धि अज्ञान के कारण होती है । अज्ञान = अविद्या = माया = भ्रम = तत् में अतत् का बोध ही विषय-वासना में प्रवृत्ति का कारण है ।
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“क्रोध कि द्वैत बुद्धि बिनु, द्वैत कि बिनु अज्ञान । मायाबस परिच्छिन्न जड़, जीव कि ईस समान ।” यहाँ इस अज्ञानजन्य विषय-वासना को ही हरि का आश्रय ग्रहण करने में सबसे बड़ी बाधा बताया गया है । बषनांजी कहते हैं, कलियुग में प्रभावशाली विषयवासना मन को चंचल करके मानव को नरकगामी बनाती है किन्तु हे हरि ! इसके दुष्चक्र से उबरने का साधन एकमात्र आपका अनन्य आश्रय ही है ।
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जप, तप, निष्कामकर्म आदि सभी को यह विषयवासना दग्ध कर देती है । यह प्रत्यक्षतः काली = दुर्गा जैसी भयानक है जो जप, तप पुण्यादि को तत्काल समाप्त कर देती है । जो दूध का आहार करते हैं, पवन का आहार करते हैं, उनकी भी बर्बादी बिना हरि का आश्रय लेने के कारण होती है क्योंकि उन पर यह अपना साम्राज्य स्थापित कर लेने में सफल हो जाती है ।
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जो बारहों मास नग्न रहकर तपस्या करते हैं उनके लिये अंगीठी ही विषय-वासना का रूप है । जो मौंन की साधना करते हैं उनके लिये मित्र की आवश्यकता ही विषय-वासना का रूप है । क्योंकि मौंनी को अपनी बात बताने के लिये किसी न किसी सहायक मित्र की आवश्यकता ही पड़ती ही है । जो जंगल में जाकर गुफा में निवास करके, तीर्थ, व्रत करके परमात्म-प्राप्ति की आशा करते हैं, उनकी वह आशा पूजै = पूर्ण = सफल नहीं होती है ।
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हे परमात्मन् ! जो आपका आश्रय छोड़कर अन्य का सहारा लेते हैं उन्हें यह विषयवासना अछूता छोड़ती नहीं है । अर्थात् उन्हें अपने प्रभाव में ले ही लेती है । जहाँ भी जाओ वहाँ पर ही आपके अतिरिक्त अन्य और कोई दूसरा आश्रय नहीं है क्योंकि सर्वत्र ही इस सूक्ष्म विषयवासना की गति होने से यह सभी स्थानों पर विचलन = मन में हलचल पैदा कर देती है ।
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वे लोग इस बात की साक्षी भरते हैं जिन्हें हे हरि आपने अपनी शरण में ले लिया; जिन्हें अपनी अभय बाँह प्रदान कर दी । क्योंकि उन्हें आपने अपनी शरणावलंबन प्रदान करके जन्म-मरण के चक्र से छुड़ाकर अमर कर दिया । मैं बषनां ने भी उनसे जाकर पूछा । उन्होंने मुझे आपकी शरणागतवत्सलता का रहस्य समझाया । ताकि = उस रहस्य को जानकर ही मैं आपके आश्रय में आया हूँ ॥१०३॥

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