रविवार, 19 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २१/२४

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग २१/२४
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सुन्दर चेतनि आतमा, जड सौं कियौ सनेह । 
देह खेह सौं मिलि रह्यौ, रतन अमोलक येह ॥२१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस चेतन आत्मा ने जड शरीर में अध्यास कर लिया; परन्तु समय आने पर वह देह तो धूल में मिल गया, पर यह आत्मा चेतन रूप होने से अमूल्य रत्न के समान यथावस्थित रह गया ॥२१॥
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दौरि दौरि जड देह कौं, आपुहि पकरत आइ । 
सुन्दर पेच पर्यौ कठिन, संक नहीं सुरझाइ ॥२२॥
यह मुग्ध(अज्ञानावृत्त) आत्मा बार बार दौड़ कर स्वयं ही इस देह में आसक्त होकर इसे पकड़ने का प्रयास करता है । यह उसके सम्मुख विशेष समस्या उपस्थित हो गयी, जिसे यह अध्यास के कारण सुलझा नहीं पा रहा है ॥२२॥
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सूवा पकरि नली रह्यौ, वह कहुं पकर्यौ नांहि । 
ऐसैं सुन्दर आपु सौं, पर्यौ पींजरा मांहि ॥२३॥
कोई शुक(तोता) स्वयं नली से चिपका हुआ है, उसको किसी ने नहीं पकड़ रखा है; इसी प्रकार वह चेतन आत्मा भी इस देह में स्वयं अध्यस्त है । इस(अध्यास) के परिणामस्वरूप यह शुक रूप आत्मा संसाररूप पिंजरे में फंसा हुआ है ॥२३॥
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ज्यौं गुंजनि को ढेर करि, मरकट मांनै आगि । 
ऐसैं सुन्दर आपही, रह्यौ देह सौं लागि ॥२४॥
जैसे कोई मूढ वानर, वर्ण में समानता के कारण, गुञ्जाओं को अग्नि का कण मान कर उनको एकत्र कर मुख से फूंक मार कर प्रज्वलित करने का व्यर्थ प्रयास करता है; इसी प्रकार यह आत्मा भी देह के साथ आसक्त होकर मूर्खता ही कर रहा है ॥२४॥
(क्रमशः) 

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