रविवार, 19 अप्रैल 2026

हर रस महगै मोलि लियौ रे

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू सचु बिन सांई ना मिलै, भावै भेष बनाइ ।*
*भावै करवत उर्ध्वमुख, भावै तीरथ जाइ ॥*
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*भ्रमविध्वंश पूर्वक भक्तिमहिमा ॥*
साषी लापचारी की ॥
हरि रस महगौ मोलि को, बषनां लियौ न जाइ  ।
तन मन जोबन सीस दे, सोई पीवौ आइ ॥१ 
(१ . इस साषी का अर्थ “सूरातन कौ अंग” में देखें ।)
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पद ॥
हर रस महगै मोलि लियौ रे ।
तन मन धन जोबन सिर साटै, साधाँ आघ कियौ रे ॥टेक॥
दूधाधारी पवन अहारी, खणि खाइ कंद जियौ रे ।
राम रसाइण लियौ न जाई, बिड़वौ रस्स पियौ रे ॥
लुंचित मुंचित मोनि जटाधर, हीवालै धसियौ रे ।
परमेसुर नैं जाणैं नांहीं, बनखँडि कौ बसियौ रे ॥
करवत घाती झंपापाती, लेकरि मुवौ हियौ रे ।
जोग जग्गि जप तप के बदलै, देखण हू न दियौ रे ॥
हैंवर गैंवर भोमि कुलातन, येतौ दैन कह्यौ रे ।
याकै बदलै राम रसाइण, मासौ हू न लहयौ रे ॥   
दिली दलाल दरीबै मिलियौ, चोखौ बणिज कियौ रे । 
गुर परसादि साध की संगति, बषनां मांगि पियौ रे ॥९४॥ 
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साटै = बदले में ।आघ = सम्मान । बिड़वौ = कड़वा, निम्नस्तरीय । लुंचित = बालों का उखाड़ने वाले जैनी साधू । मुंचित = मूंड मुंड़ाने वाले संन्यासी । मोनि = न बोलने वाले । 
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करवतघाती =  अंग्रेजों के राज के पहले काशी में एक बहुत ही गहरा कुवा था । उसके मुँह पर एक विशाल आरा हुआ था । बहुत से लोग “जीवनमुकति हेतु जनु कासी”, “कासी मरत परमपद लहही” ‘काशी मरणान्मुक्ति’ काशी में मरने से मुकति हो जाती है, विधिवाक्य पर विश्वास करके बहुत ऊँची दीवार से उस आरे पर कूद पड़ते थे जिससे उनका शरीर कटकर उस अंध कूप में गिर जाता था । इसे ही करवत-कासी के नाम से जाना जाता है । अंग्रेजों ने इस प्रथा को बंद करवा दिया ।
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झंपापाती = पहाड़ से पात होना = लुड़ककर, गिरकर मरना । हैंवर = हय = घोड़ा । गँवर = गय = हाथी । कुलातन = शरीर की वलि । दिली दलाल = परमात्मा से मिलाने वाले गुरु । दिल में निवास करने वाला परमात्मा दिली है । दरीबै = बाजार में, बिना प्रयत्न के, अनायास ही गुरुमहाराज मिल गए । साधना रूपी विणज = व्यापार प्रभूत मात्रा में किया । 
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बषनांजी अपनी स्थिति स्पष्ट करते हुए कहते हैं, मैंने परात्पर-परब्रह्म-हरि रूपी रसायन बहुत मूल्य देकर = बहुत कुछ त्यागकर(परमात्मा को प्राप्त करने के लिये ब्रह्मा के लोक के सुख ही नहीं उनको प्राप्त करने की स्पृहा तक त्यागनी पड़ती है । यह त्याग त्यागने के पुर्व तक बड़ा लगता है किन्तु जब परमात्मा का साक्षात्कार हो जाता है तब यह अत्यंत तुच्छ  लगता है ।) प्राप्त किया है । 
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मैंने तन, मन, धन, यौवन तथा अपने शिर = आपा = अहंकार के बदले ,में इस रसायन को प्राप्त किया है । जिसकी(इस त्याग की) साधू संतों ने बहुत ही प्रशंसा की है । अधिकांश साधक या तो दूध का आहार करके या निराहार रहते हुए मात्र पवन का आहार करके या कंद-मूल खोदकर खाते हुए परमात्मा को प्राप्त करने के प्रयत्न कटे हैं । उने राम-नाम स्मरण रूपी रसायन तो किया नहीं जाता उल्टे वे उक्त निम्नकोटि के उपाय रूपी कड़वे रसायनों को पीते रहते हैं । 
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बहुत से साधक अपने शरीर के बालों को उखाड़कर फैंकते हैं । बहुत से मोनी मूंड को मुंडवाते हैं । कुछ मोनी मौन धारण करने रूपी साधना करते हैं तो कुछ बालों को बढ़ाकर जटाधारी बन साधना करते हैं । कुछ साधक ऐसे भी हैं जो हिमालय की कुन्दराओं में घुसकर एकांत में साधना करते हैं । किन्तु इन साधनाओं के बल पर वनखण्ड में निवास करने वाले ये परमात्मा का साक्षात्कार नहीं कर पाते हैं । 
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बहुत से लोग काशी में मरने से मुक्ति होती है की बात को ध्यान में रखकर आरे पर गिरकर घात करते हैं तथा कुछ पर्वत से गिरकर अपना प्राणांत करते हैं । कुछ मोनी योग, यज्ञ, जप-तप के बदले में परमात्मा को प्राप्त करने का प्रयत्न करते हैं किन्तु उनको परमात्मा ने अपना दर्शन देखने मात्र को भी नहीं दिया उनके हृदय में हमेशा-हमेशा के लिये विराजित हो जाना तो आगे की बात है । 
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कुछ लोग परमात्मा के सामने हठी, घोड़े, भूमि आदि का दान देने व् नरवलि आदि करने की बात निवेदन करते हैं किन्तु इनके बदले में वे मासा मात्र = तुच्छातितुच्छ मात्रा में भी राम-रसायन की प्राप्ति नहीं कर पाते हैं । (मासा = पुराने समय में चलने वाले माप का नाम ।  तौला, माशा, रत्ती आदि) 
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मुझ बषनां को परमात्मा से मिलाने वाले दलाल = गुरु दरीबै = बाजार में = अनायास ही मिल गये जिन्होंने मुझे राम-रसायन के व्यापर करने की युक्ति रूपी साधना बता दी जिससे मैंने अच्छी मात्रा में व्यापार किया = राम नाम की साधना करी । परिणामस्वरूप मैं बषनां ने गुरुमहाराज के प्रसाद(कृपा) से और साधुओं की संगति से राम रसायन को मांग-मांगकर खूब पिया है । साधना कर करके राम रसायन का खूब रसास्वादन किया है ॥९४॥ 

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