🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू निमिष न न्यारा कीजिये, अंतर थैं उर नाम ।*
*कोटि पतित पावन भये, केवल कहतां राम ॥*
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*परिचय, आत्म-साक्षात्कार ॥*
अब मैं राम पदारथ लाधौ ।
राम रतन धन लाधौ फड़कै बांधौ ॥टेक॥
गाँठी बांधौ देखौ खोई । जिव की जीवनि आनँद होई ॥
रतन लह्यौ पणि परिख न काई । तोल्यौ जोख्यौ मिण्यौं न जाई ॥
ज्यूँ किरपण धन धरै छिपाइ । दिन कौ तिहनैं देखण जाइ ॥
बषनौं कह मैं तौ क्यूँ पायौ । छिपै नहीं परगट ह्वै आयौ ॥१०५॥
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लाधौ = प्राप्त किया । राँकि = रंक । फड़कै = पल्ला । जिव की जिवनि = जीवन का सर्वस्व । तोल्यौ = तौला नहीं जा सकता । जोख्यौ = जोखना तौलने को ही कहा जाता है । मिण्यौं = मापा नहीं जा सकता ।
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बषनांजी स्वानुभव बताते हुए कहते हैं, अब मैंने रामजी रूपी पदारथ को प्राप्त कर लिया है । मैं रंक ने रामजी रूपी रत्न धन को प्राप्त करके अपने हृदय रूपी पल्ले में बांधकर सुरक्षित रख लिया है । मैंने उसे हृदय रूपी गाँठ में बांध लिया है और बारबार उसे देखता हूँ कि कहीं वह खो न जाये ।
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वह मेरे जीवन का सर्वस्व है । उसके होने से सदैव आनन्द ही आनन्द की प्राप्ति = अनुभूति होती है । मैंने रामजी रूपी रत्न प्राप्त कर लिया है किन्तु वह तत्त्व इतना अनूपम = अनोखा है कि वजन करने पर तौला नहीं जा सकता तथा लम्बाई-चौड़ाई नापने पर नापने में नहीं आता । तुल्यता करने पर अन्यों से इक्कीस ठहरता है अर्थात् अनूपम है ।
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जिस प्रकार कृपण धन को छिपाकर रखता है तथा प्रतिदिन उसे देखता है कि कहीं किसी ने उसे चुरा तो नहीं लिया है । अर्थात् उस कृपण की मनोवृत्ति सदैव उस धन में ही लगी रहती है । उसी प्रकार मेरी मनोवृत्ति सदैव उसी में लगी रहती है । किन्तु मुझ बषनां को जो कुछ भी रामजी रूपी पदारथ मिला है वह छिपाये छिपता नहीं है । वह तो सबके सामने प्रकट हो गया है । क्योंकि वह छिपने की वस्तु नहीं है ॥१०५॥

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