बुधवार, 29 अप्रैल 2026

२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ९/१२

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ९/१२
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जाकी सत्ता पाइ करि, सब गुन ह्वै चैतन्य । 
सुन्दर सोई आतमा, तुम जिनि जानहुं अन्य ॥९॥
जिस की सत्ता(सङ्ग) पा कर ये सब अचेतन गुण चैतन्य धारण कर लेते हैं, वह चेतन आत्मा ही है । तुम इसे कोई अन्य न समझो ॥९॥
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बुद्धि भ्रमै मन चित्त पुनि, अहंकार बहु भाइ । 
सुन्दर ये तौं तैं भ्रमै, तूं क्यौं इनि संग जाइ ॥१०॥
उन क्षुधा तृषा, शोक मोह से देहस्थित बुद्धि, मन चित्त एवं अहङ्कार ये तेरे द्वारा ही सञ्चालित होते हैं । श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे आत्मन् ! ये भ्रान्त होते हैं तो होते रहें; तूं भी इनके साथ लग कर भ्रान्ति में क्यों पड़ता है ! ॥१०॥
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श्रोत्र त्वचा दृग नासिका, रसना रस कौं लेत । 
सुन्दर ये तौं तैं भ्रमै, तूं क्यौं बांध्यौ हेत ॥११॥
श्रोत्र, त्वचा, नासिका, चक्षु एवं रसना - ये सभी ज्ञानेन्द्रियाँ तेरे ही सहारे से अपना अपना विषय ग्रहण करने में समर्थ हो पाती हैं; क्योंकि इन का सञ्चालक तूं है, अतः ये भ्रान्त होती हैं तो होती रहें । तूँ इनके साथ अपनी आसक्ति(= हेत) क्यों रख रहा है ? ॥११॥
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बाक्य पानि अरु पाद पुनि, गुदा उपस्थ हि जांनि । 
सुन्दर ये तो तैं भ्रमैं, तूं क्यौं लीने मांनि ॥१२॥
हे आत्मन् ! वाणी, हाथ, पैर, गुदा एवं मूत्रेन्द्रिय - ये कर्मेन्द्रियाँ भी तेरे ही आश्रयण से सञ्चालित होती हैं, अतः इन को तूं अपना सञ्चालक क्यों मान रहा है ॥१२॥
(क्रमशः) 

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