बुधवार, 15 अप्रैल 2026

*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~३७/४०*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~३७/४०*
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*वचन बाट बहुतै१ चली, जीव खड़ा तहँ आय ।*
*रज्जब गुरु भेदी२ बिना, प्राण३ पंथ किहिं जाय ॥३७॥*
जिनने शास्त्र वचन रूप मार्ग में बहुत ही१ गमन किया है, अर्थात पढ़ गये है, वेद दर्शनाचार्य हो गये हैं । ऐसे विद्वानों के पास आकर जीव कल्याणार्थ स्थित होते हैं किन्तु शास्त्र में अनेक मार्ग बताये हैं । जब तक किसी भी एक साधन को सांगोपाँग करके ब्रह्म प्राप्त न कर सके, तब तक साधना मार्ग का पूरा रहस्यवेता२ नहीं हो सकता । अत: साधन-मार्ग के रहस्यवेता सद्गुरु के बताये बिना साधक३ किस साधन-मार्ग ब्रह्मप्राप्ति के लिये आगे बढे ? विद्वान तो पठित वचन सुना देता है । साधन-मार्ग में उसकी गति नहीं होती जो ठीक साधन बता सकते ।
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*रज्जब राजा बिन कटक, बनजारों बिन बैल ।*
*त्यों सद्गुरु बिन शब्द दल, ह्वै न काज१ की सैल२ ॥३८॥*
राजा बिना सेना का और बनजारों बिना बैलों का गमन ठीक नहीं होता, वैसे ही सद्गुरु बिना शब्द - सैन्य का भी अज्ञान नाश रूप कार्य१ सिद्ध हो सके ऐसा गमन२ नहीं हो सकता अर्थात सद्गुरु बिना केवल शब्दों से ब्रह्म प्राप्ति होना संभव नहीं है ।
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*रज्जब आतिशबाज१ बिन, गोला नालि२ न काज ।*
*ऐसी विधि गुरु बिन गिरा, ज्यो नर बिन गज बाज३ ॥३९॥*
बारूद बनाने वाले१ के बिना गोला, गोली, तोप२, बन्दुक३ किस काम की हैं ? ये सब बारूद होने पर ही काम देती हैं तथा मनुष्य बिना हाथी और अश्व भी किस काम के हैं अर्थात ये मनुष्य के द्वारा ही काम करते हैं । वैसे ही सद्गुरु बिना वाणी ब्रह्म प्राप्ति कराने में सफल नहीं हो सकती ।
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*पुस्तक पैगह१ वचन सु बाज२, अर्थ असवार गुरु गति राज ।*
*चढे चढाये नहिं तहँ नाहिं, रज्जब रचना यह दल३ माँहीं ॥४०॥*
पैदल१ सेना, अश्व२ और सवार की गति राजा के अधीन है, राजा आज्ञा देता है, उसी प्रकार सेना३ में चढाई करना रूप रचनात्मक कार्य की व्यवस्था होती है, नहीं आज्ञा दे तो नहीं होती । वैसे ही पुस्तक, वचन और अर्थ ये गुरु के द्वारा ही कार्य करने में समर्थ होते हैं । गुरु इनका अज्ञान नाशार्थ प्रयोग करे, तो अज्ञान को नष्ट करते हैं, नहीं तो नहीं कर पाते ।
(क्रमशः)

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