🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
.
२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ४१/४४
.
सुन्दर वाकी सुधि गई, जाकैं लागी बाइ ।
कहै और की और ई, जो भावै सो खाइ ॥४१॥
ज्वर रोग की वाताधिक सन्निपात अवस्था में रोगी अपनी शुद्ध स्मृति खो बैठता है । उस अवस्था में वह प्रलापयुक्त मिथ्या बातें बोलने लगता है । तथा सर्वाहारी(निषिद्ध भोजन खाने वाला) भी बन जाता है ॥४१॥
.
काहू सौं बांभन कहै, काहू सौं चंडाल ।
सुन्दर ऐसौ भ्रम भयौ, यौं ही मारै गाल ॥४२॥
इस सन्निपात अवस्था में वह किसी को अपनी ब्राह्मण जाति बताता है तो किसी को चाण्डाल(अस्पृश्य शूद्र) । कहने का तात्पर्य यह है कि वह अपनी इस भ्रमात्मक दशा में अनर्गल प्रलाप करने लगता है ॥४२॥
.
ज्यौं अमली की ऊंघतें, परी भूमि पर पाग ।
वह जानै यह और की, सुन्दर यौं भ्रम लाग ॥४३॥
किसी अमली(अफीमची) की, अफीम खाने के बाद, उस के शिर की पगड़ी भूमि पर गिर गयी तो उसने, नशे के अतिशय प्रभाव के कारण, उस पगड़ी को दूसरे के शिर से गिरी हुई पगड़ी समझ लिया। मस्तिष्क के भ्रान्त हो जाने पर, सब की यही स्थिति हो जाती है॥ ४३ ॥
जैसैं चिल्लीसेख हू, कियौ मनोरथ और ।
सुन्दर भूलौ आपु कौ, यौं हूवौ घर चौर ॥४४॥
जैसे कोई शेख चिल्ली(कल्पित मूर्ख) कुछ अन्य बात सोचता हुआ किसी अन्य के घर को अपना समझ कर, उसमें प्रविष्ट हो जाय तथा वहाँ चौर समझा जा कर पकड़ा जाय ! तो स्वस्थिति भूल जाने वाले को ऐसे ही परिणाम भोगने पड़ते हैं ॥४४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें