शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

*१०. विरह का अंग~ ५/८*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०. विरह का अंग~ ५/८*
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*विरहनि बिहरे१ रैन दिन, बिन देखे दीदार ।*
*जन रज्जब जलती रहै, जाग्या विरह अपार ॥५॥*
विरहनी प्रियतम के दर्शन बिना चैन न पड़ने से रात-दिन इधर-उधर विचरती१ है । अपार विरह उत्पन्न हो जाने से विरह-व्यथा से जलती रहती है ।
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*रज्जब कहिये कौन सौं, इस विरहा की बात ।*
*मानहुँ रावण की चिता, अह निशि नहीं बुझात ॥६॥*
इस विरहाग्नि की बात किससे कहें, यह तो मानो रावण की चिता ही बन गई है, दिन-रात बुझती ही नहीं ।
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*विरहा पावक उर वसे, नख शिख जारे देह ।*
*रज्जब ऊपर रहम१ कर, वर्षहु मोहन मेह२ ॥७॥*
यह विरह रूप अग्नि हृदय में बसता है और नख से शिखा तक शरीर को जला रहा है । हे विरह-विमोहन परमात्मा रूप बादल२ मुझ पर अनुग्रह१ करके दर्शन रूप वर्षा कर इसे बुझाइये ।
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*विरहनी वसुधा की अगनि, ब्रह्म व्योम क्यों जाहि ।*
*रज्जब वर वर्षा बिना, उर धर क्यों सु सिराहि ॥८॥*
जैसे पृथ्वी के वन का अग्नि आकाश में जाकर जल से नहीं बुझता और न वर्षा बिना बुझता है । वैसे ही विरहनि के हृदय का अग्नि ब्रह्म के पास नहीं जा सकता और न किसी अन्य से बुझता है, वह ब्रह्मरूप स्वरूप का हृदय में दर्शन होने से ही बुझता है ।
(क्रमशः)

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