शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

मन रे प्रीति कहैं सति सोई

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू तो पीव पाइये, कर सांई की सेव ।*
*काया मांहि लखाइसी, घट ही भीतर देव ॥*
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*प्रेम-प्रीति ॥*
मन रे प्रीति कहैं सति सोई ।
जाकै जीवताँ सो मूवाँ पाछैं होई ॥टेक॥ 
ज्यूँ सूरै सूरातन कीयौ, तन मन त्याग्यौ लोई ।
पहली थी सो पाछै रही, मारो मार रणौही ॥
देही गइ पणि नेह न भूली, जाली बाली काटी ।
अनलहक अनलहक कहि बोली, मूवाँ पाछै माटी ॥
सरीर गयौ पणि सुरति न भूली, प्रीति सोहि सति जाणी ।
बषनां बिरहणि मरि करि पीयौ, बैरी के मुहि पाणी ॥९२॥
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इतिहास में दो ही व्यक्तियों के उदाहरण ऐसे मिलते हैं जिनके मरने के उपरान्त भी जिनके शरीर से ‘अनहलक-अनहलक’ तथा ‘राम-राम’ की ध्वनि आती रही । पहला उदाहरण मंसूर का है तथा दूसरा स्वामी रामचरण का है । 
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स्वामी रामचरण ने अपनी वाणी में कहा है “राम नाम सूँ प्रीति करि, तन मन सूँज समेत । प्राण गयाँ छूटै नहीं, ज्यूँ बेल बृक्ष कौ हेत ॥” जिस प्रकार सूख जाने पर भी बेल वृक्ष पर ही लिपटी रहती है, ऐसे ही साधक को भी रामनाम से प्रीति इस प्रकार की करनी चाहिये कि शरीर से प्राणों के निकल जाने पर भी निर्जीव शरीर भी उसी प्रकार प्रीति करता रहे जैसे जीवित अवस्था में करता था । 
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स्वामी रामचरण तथा मंसूर के सम्बन्ध में यह बात सर्वथा खरी उतरती है । बषनांजी ने उक्त पद में मंसूर का उदाहरण दिया है । आगे उन्हीं के शब्दों में पढ़िये । स्वामी रामचरणजी के बारे में विशेष जानने के लिये मेरे द्वारा लिखित ‘श्रीरामचरण-चरितामृत’ तथा सम्पादित ‘जगन्नाथ-ग्रन्थावली’ मंगाकर पढ़े । यहाँ मन = मनधारी जीव का वाचक है ।
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हे जीव ! सच्ची प्रीति उसको ही कहते हैं जो जैसी जीवित अवस्था में होती है । वैसी की वैसी ही देह में से प्राणों के निकल जाने के उपरान्त भी विद्यमान रहे । रणौही = रणारोही = युद्धरत शूरवीर जिसप्रकार अपने समस्त लोई = परिचित-अपरिचित लोगों के प्रति तन-मन से रागशून्य होकर रण में सूरातन = युद्ध करते हुए मर जाता है तब भी युद्ध करते समय उसके मुँह से जो शब्द ‘मारो-मारो’ ‘काटो-काटो’ निकलते थे । वे ही मरने के उपरान्त भी निकल रहे होते हैं । वास्तव में ऐसे लोग ही शूरवीर कहलाते हैं । 
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इसी प्रकार पार्थिव शरीर से प्राणों के निकल जाने पर भी माटी = मंसूर का मृतशरीर टुकड़े-टुकड़े करके काट देने व जला-बलाकर भस्म कर देने के उपरान्त भी पूर्व का प्रेम नहीं भूला और अनलहक-अनलहक का उच्चारण करता रहा । यद्यपि मंसूर का शरीर तो नष्ट हो गया किन्तु उसकी वृत्ति अनलहक-अनलहक का उच्चारण करती रही । वास्तव में सच्ची प्रीति करना इसी का नाम है । 
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बषनां कहता है, इतना ही नहीं जब मंसूर का शरीर की राख तक ने अनलहक की ध्वनि करना नहीं छोड़ा तब उसके बैरी बादशाह ने उस राख को नदी में प्रवाहित करा दिया और वह पानी पनिहारी के द्वारा बादशाह के घर में पहुँचकर बादशाह द्वारा पी लिया गया । बादशाह के पेट में भी मंसूर के शरीर की राख जो पानी के साथ प्रविष्ट हो गई थी अनलहक-अनलहक बोलने लगी । 
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तब बादशाह ने कहा, मेरे पेट में से कैसे अनलहक की ध्वनि आती है । तब बुद्धिमानों ने सारा रहस्य खोला जिससे बादशाह भी ‘अनलहक’ वह परमात्मा मैं ही हूँ कहने लग गया (देखें राघवदासजी का भक्तमाल) अंतिम पंक्ति का अर्थ मछली पर भी घटता है । मछली का शरीर चला जाता है किन्तु वह पानी को नहीं भूलती क्योंकि उसने ही सच्ची प्रीति के रहस्य को जाना है । 
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बषनां कहता है, पानी की विरहणी मछली ने मरकर, रंधकर तथा मारने वाले वैरी के द्वारा खा जाने के उपरान्त भी बैरी के मुख से पानी पीकर पानी के प्रति अपने अनन्य अनुराग को सिद्ध कर दिया । मछली रंधती भी पानी में ही है तथा खाने के बाद खाने वाला पीता भी पानी ही है । अतः मछली मरने पर भी पानी ही के सानिध्य में रहती है । 
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यही मछली का सच्चा प्रेम है । 
“मीन उरग दादुर कुरम इनकौ जल मैं बास । 
रामचरण पणि मीन कौ है सांचौ घर वास ॥ 
है साँचौ घर वास नीर बिछड़त तन छाड़ै । 
और गहै जल वौट कामना आनै हाँड़े । 
पतिबरता कै पीव पणि बिभचारिणी दूजी आस । 
मीन उरग दादुर कुरम इनकौ जल मैं बास ।” ॥९२॥

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