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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग १३/१६
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मरकट मूठ न छाडई, बंध्यौ स्वाद सौं जाइ ।
सुन्दर गर मैं जेवरी, घर घर नाच्यौ आइ ॥१३॥
या जैसे कोई मूर्ख वानर, चने के लोभ में, घड़े में फंसी हुई अपनी मुट्ठी नहीं खोलता और उसके परिणामस्वरूप बाजीगर द्वारा पकड़ लिया जाता है, और वह बाजीगर इस के गले में रस्सी बांध कर ग्रामों में घर घर ले जाकर नचाता रहता है ॥१३॥ (२)
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जैसैं मदिरा पान करि, होइ रह्या उन्मत्त ।
सुन्दर ऐसैं आपु कौं, भूल्यौ आतम तत्त ॥१४॥
या जैसे कोई मद्य(शराब) पीने वाला मद्यपान के कारण उन्मत्त होकर स्व रूप को भूल जाता है, वैसे ही यह जीवात्मा भी वासनाओं के मद में उन्मत्त होकर स्व रूप को भूल गया है ॥१४॥ (३)
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ज्यौं ठगमूरी खात ही, रहै कछू नहिं बुद्धि ।
यौं सुन्दर निज रूप की, भूलि गयौ सब सुद्धि ॥१५॥
जैसे कोई उन्मादकारी औषध खाते ही किसी की बुद्धि भ्रष्ट हो जाती है, वैसे ही यह जीवात्मा भी भवजाल में फंस कर अपनी स्मृति विलुप्त कर बैठा है ॥१५॥
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जैसैं बालक शंक करि, कंपि उठै भय मांनि ।
ऐसैं सुन्दर भ्रम भयौ, देह आपु कौ जांनि ॥१६॥
जैसे कोई बालबुद्धि(मुर्ख) पुरुष अन्धकार में स्थाणु को देखकर उस में भूत का भ्रम कर भय मान बैठता है; उसी प्रकार इस जीवात्मा ने भ्रम से देह को अपना मान कर उसी में अध्यास कर लिया है ॥१६॥
(क्रमशः)

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