गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ३७/४०

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. स्वरूप विस्मरण को अंग ३७/४०
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कतहू भूलौ मौंनि धरि, कतहू करि बकवाद । 
सुन्दर या अभिमान तें, उपज्यौ बहुत बिषाद ॥३७॥
इस अभिमान के कारण ही कहीं वह मौन धारण कर लेता है, कहीं व्यर्थ प्रलाप(वितण्डावाद) करने लगता है । इस द्विविधामय स्थिति के कारण ही वह सङ्कटग्रस्त हो जाता है ॥३७॥
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सुन्दर यौं अभिमान करि, भूलि गयौ निज रूप । 
कबहूं बैठै छांहड़ी, कबहूं बैठै धूप ॥३८॥
इस प्रकार, यह आत्मा देहाभिमान के कारण स्वकीय रूप ही भूल गया है । तब यह कभी विषयभोगों की शीतल छाया में सुख मानता है तो कभी वह कठोर साधना धूप में बैठ कर ही सुख मानता है ॥३८॥
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सुन्दर ऐसौ भ्रम भयौ, छूटौ अपनौ भौंन । 
दिशा भूल जानै नहीं, पूरब पच्छिम कौंन ॥३९॥
उक्त देहाभिमान के कारण वह भ्रम के ऐसे प्रबल झंझावात(आंधी) में फंस गया कि वह अपना वास्तविक स्थान(भवन) ही भूल बैठा । इतना ही नहीं, वह उधर जाने की मार्गबोधक दिशाओं को भी भूल गया कि किधर पूर्व दिशा है ? या किधर पश्चिम दिशा ? ॥३९॥
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सुन्दर वाकी सुधि गई, जाकौं लाग्यौ भूत । 
काहू सौं बनिया कहै, काहू सौं रजपूत ॥४०॥
लोक में भी हम देखते हैं कि भूत प्रेत से आविष्ट पुरुष की संज्ञा(होश = ज्ञान) नष्ट हो जाया करती है । इसी कारण वह किसी के पूछने पर कभी स्वयं को बनिया(वैश्य) बताने लगता है तो किसी को राजपूत(क्षत्रिय) ॥४०॥
(क्रमशः) 

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