गुरुवार, 23 अप्रैल 2026

हरि आवै हो कब देखौं

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू तो पीव पाइये, भावै प्रीति लगाइ ।*
*हेजैं हरि बुलाइये, मोहन मंदिर आइ ॥*
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*राग केदारौ ॥६॥ विरह ॥*
हरि आवै हो कब देखौं आंगण म्हारै ।
कोई सो दिन होइ रे जा दिन चरण धारै ॥टेक॥
सुंदर रूप तुम्हारौ देखौं नैनौं भरे ।
तन मन ऊपर वारौं नौछावरि करे ॥
तारा गिणताँ मोहि बिहावै रैंणि निरासी ।
बिहरणी बिलाप करै हरि दरसन की प्यासी ॥
बिण देखें तन तालाबेली कामणी करै ।
मेरौ मन मोहन बिन धीर न धरै ॥
बषनां बारम्बार हरि कौ मारग देखै । 
दीनदयाल दया करि आवो सोई दिन लेखै ॥९८॥
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मेरे आंगन रूपी हृदय में प्रियतम रूपी परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा का कब तो प्राकट्य होगा और कब मैं उसे नैनों भर कर देखूंगी । ऐसा कौनसा दिन होगा जिस दिन मेरे आंगन में प्रियतम के चरण पड़ेंगे । वह दिन कौनसा होगा जिस दिन नयन भरकर मैं तुम्हारे अप्रतिम सुन्दर रूप को देख सकूंगी । वह दिन कौनसा होगा जिस दिन मैं पूर्ण समर्पण के साथ तन और मन तुम पर वार दूंगी, न्यौछावर कर दूंगी । 
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हे प्रियतम ! निराशा से पूर्ण तारों को गिनते-गिनते (समय-देखते-देखते कि अब प्रातःकाल हो और अब प्रियतम की स्मृति काम-काज में लग जाने से कम हो) ही पूरी रात्री व्यतीत हो जाती है । प्रियतम के दर्शनों की भूखी विरहनी विलाप करती है कि हे प्रियतम जल्दी मेरे घर में पधारो । कामिनी = प्रियतमा का बिना प्रियतम को देखे सारा ही शरीर व्याकुल है । हे मोहन प्रियतम ! मेरा मन बिना मोहन = तुम्हारे अब धीरज खोता जा रहा है, अधीर हुआ जा रहा है । 
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मैं बषनां विरही बारबार परात्पर-परब्रहम रूप प्रियतम के पधारने के मार्ग को देखता हूँ कि वह किस रास्ते से कब आ रहा है । अतः हे दीनों पर दया करने वाले दीनदयाल प्रियतम ! दया करके आप जिस दिन मेरे घर में पधार जाओगे, बस मेरा वही दिन लिखने योग्य होगा = गिनने से आयेगा, तदतिरिक्त सभी दिन व्यर्थ गये मानूंगा ॥९८॥ 

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