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*॥ श्री दादूदयालवे नम: ॥*
*॥ दादूराम~सत्यराम ॥*
*"श्री दादू पंथ परिचय" = रचना = संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान =*
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अध्याय १६, आचार्य पर्व -
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आचार्यों की महानता ~ नारायणा दादूधाम के जितने पीठाधीश आचार्य हुये हैं, वे सभी महानुभाव महान् महात्मा हुये हैं । यह उनके उक्त विवरण से ही ज्ञात होता है । वे सभी संत- साधना पद्धति से संपन्न, निज नाम का निरंतर चिन्तन, निगुर्ण भक्ति में निष्ठा, सहन- शक्ति, आसुर गुण विजय, दैवीगुण संपादन, अभेद निश्चय, सर्व हितैषिता, मिलनसारिता, संतोष, क्षमाशीलता, शीलव्रत संपन्नता, निष्पक्षता, उपदेशों द्वारा लोकहित के कार्यों में तत्परता, स्वार्थहीनता, परमार्थ में निपुणता दीनों पर दया, परोपकार, समय सद्उपयोगिता, इत्यादिक विशेषतायें नारायणा दादूधाम के पीठाचार्यों में विशेष रुप में ज्ञात होती है । ये सभी ही आचार्य पद पर रहते हुये निरंजनराम की भक्ति में ही तत्पर रहते थे ।
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नारायणा दादूधाम के पीठाचार्यों में कई आचार्य तो ऐसे पहुँचे हुये महान् सिद्ध पुरुष हुये हैं जिनकी कितनी ही चमत्कार की कथायें आज भी प्रसिद्ध है । वे केवल बनावटी कथायें ही हों सो बात नहीं है । उनके प्रमाण भी मिलते रहे हैं और अब तक भी प्राप्य हैं ।
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उनके त्याग और तप तेज के कारण ही- जयपुर, जोधपुर, अलवर, कोटा, बूंदी, उदयपुर, सीकर, खेतडी, करोली, नाभा, पटियाला, जीन्द, फरीदकोट आदि राजाओं के वे पधारते थे तब उनको नगर में प्रवेश कराने आदि के नियम बने हुये थे । आचार्य अपने आने की सूचना देते थे तब उसी समय राजकीय सम्मान से उनको नगर में प्रवेश कराया जाता था ।
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अनेक राज्यों की ओर से गांव, जमीन, कुये आदि भी भेंट किये गये थे । राजा लोग स्वयं भी आचार्यों के पास आते जाते थे, उपदेश सुनते थे । स्वयं भारत का बादशाह जहांगीर भी आचार्य गरीबदासजी के पास आया था । उदयपुर महाराणा फतेसिंह जी को नारायणा दादूधाम में मैंने स्वयं आचार्य दयारामजी महाराज के समय अपनी आखों से देखा था ।
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अनेक राजाओं ने आचार्यों के श्रद्धा भक्ति पूर्वक चातुर्मास कराये हैं । राजाओं के समान प्रजागण भी नारायणा दादूधाम के पीठाचार्यों का अति सम्मान करते थे । इससे अपने आप ही सिद्ध होता है कि वे सब महान् हुये हैं ।
(क्रमशः)

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