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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२३. अथ स्वरूप विस्मरण को अंग १/४
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सुन्दर भूलौ आपकौं, खोई अपनी ठौर ।
देह मांहिं मिलि देह सौ, भयौ और कौ और ॥१॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - इस जीवात्मा ने स्व रूप को भूल कर अपनी वास्तविक स्थिति ही विलुप्त कर दी । उसने इस देह में मिथ्या अध्यास कर इसी में आसक्त होकर, अपनी वास्तविक स्थिति से परिवर्तित होकर, यह इस हीनतम स्थिति(दशा) में जा पहुँचा ॥१॥
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जा घट की उनहारि है, तैसौ दीसत आहि ।
सुन्दर भूलौ आपु ही, सो अब कहिये काहि ॥२॥
यह (जीवात्मा) अपने प्रारब्धवश जिस योनि(शरीर) में जाता है वहाँ वह अपनी क्रियाओं(चेष्टाओं) से उस शरीर के अनुरूप जैसा ही दीखने लगता है । तथा अपनी वास्तविक(तटस्थ रहना) स्थिति को भूल जाता है । अब यह इसका उपालम्भ किसको दें; क्योंकि यह उसका अपना ही किया हुआ प्रमाद(गलती) है ! ॥२॥
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हाथी मांहे देखिये, हाथी कौ अभिमांन ।
सुन्दर चींटी मांहिं रिस, चींटी कै अनुमांन ॥३॥
जब यह प्रारब्धवश हाथी की योनि(शरीर) में पहुँचता है तो यह हाथी के समान मदोन्मत्त रहकर वैसी ही सब क्रियाएँ(चेष्टाएँ) करने लगता है और यदि यह कभी चींटी का शरीर धारण करता है तो चींटी के समान ही चेष्टाएँ करता है ॥३॥
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सिंह मांहिं है सिंह सौ, स्याल मांहिं पुनि स्याल ।
जैसी घट उनहार है, सुन्दर तैसौ ख्याल ॥४॥
इस प्रकार, इस के सिंह की योनि में पहुँचने पर इस की सिंहसदृश चेष्टाएँ होने लगती हैं और श्रुगाल(गीदड़) की योनि में पहुँचने पर श्रुगाल जैसी । कहने का तात्पर्य यही है कि यह(जीवात्मा) प्रारब्धवश जिस शरीर में पहुँचता है उस शरीर के आकार के अनुरूप ही उस की शारीरिक चेष्टाएँ भी होने लगती हैं ॥४॥
(क्रमशः)

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