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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग~४५/४८*
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*अरिल - सद्गुरु सूरज कांति, सूर सम है धणी१ ।*
*शब्द सलिल कफ२ कान, गुरु शिष अति बणी ॥*
*आदम३ अश्म४ असंख्य तहाँ नहिं यहु कला ।*
*परिहाँ रज्जब योग दुर्लभ भाग लहि ये भला ॥४५॥*
सूर्य किरण द्वारा बर्षा जल अँजली२ में प्राप्त हुआ हो और सूर्य प्रकाश भी हो, तब सूर्य का प्रतिबिम्ब अंजली के जल में भासता है, वैसे ही ब्रह्म-ज्ञान युक्त गुरु के शब्द कान द्वारा शिष्य के हृदय में जावें और ब्रह्म१ का ज्ञान रूप प्रकाश हो, तब ब्रह्म का साक्षात्कार होता है । इस प्रकार के गुरु - शिष्य हों, तब उनकी विशेष रूप से बनती है । अन्यथा पत्थर४ रूप मनुष्य३ असंख्य हैं, किन्तु उनमें यह ज्ञान कला प्रगट नहीं होती । यह जीव का मिलन रूप योग होना अति दुर्लभ है, कोई अच्छे भाग्य से ही मिलता है ।
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*चिदानन्द चन्द्र सु कला, चन्द्र मणी गुरु संत ।*
*उभय मिलत अमृत स्रवे, पीव हिं जीवन जंत ॥४६॥*
चन्द्र किरण चन्द्रमणी पर पड़ती है तब उससे अमृत टपकने लगता है, उसे पान कर प्राणी जीवित रहते हैं । वैसे ही चिदानन्द ब्रह्म का ज्ञान-प्रकाश गुरु रूप संत में आता है, जब गुरु से ज्ञानामृत टपकने लगता है, उसे जिज्ञासु जीव पान करके ब्रह्मरूप नित्य जीवन प्राप्त करते हैं ।
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*शब्द बीज करसा गुरु, चेला चकहुँ१ स्वरूप ।*
*नाम नाज यूं नीपजे, महर मेघ हरि भूप ॥४७॥*
राजा की कृपा से भूमि१ मिले, किसान उसमें बीज बोये फिर भली प्रकार मेघ बर्षा करे तब नाज उत्पन्न हो । वैसे ही गुरु अपने शब्दों से शिष्य को उपदेश करे और हरि कृपा हो तब निरंतर हरिनाम चिन्तन द्वारा ब्रह्म निष्ठा प्राप्त होती है ।
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*शब्द आरसी१ अर्थ सु आगी,
*सतगुरु सविता२ सन्मुख जागी ।*
*आरति४ बीच अहार३ अनूपा,*
*प्रीतम पावक प्रकटहि रूपा ॥४८॥*
आतशी शीशा१ में सूर्य२ कभी किरण पड़ती है तब उससे अग्नि निकलता है, उस शीशे के नीचे अग्नि के भोजन३ रूप कोमल तृण रूई आदि कुछ होता है तब वह अग्नि प्रकट रूप में आकर तृणादि को भस्म करता है । वैसे ही सद्गुरु के सन्मुख शब्द आते है तब उनसे अर्थ निकलता है और हरि वियोग दुख४ से युक्त साधक के हृदय में अनुपम प्रियतम का स्वरूप प्रकट होता है, वह वियोग व्यथा को नष्ट कर डालता है ।
(क्रमशः)

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