🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*रोम-रोम रस प्यास है, दादू करहि पुकार ।*
*राम घटा दल उमंग कर, बरसहु सिरजनहार ॥*
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विरह ॥ साषी लापचारी की ॥१
(१ इन साषियों का अर्थ ‘विरह का अंग’ में देखें)
राम राइ दरसनि कारनि तेरे, झड़ लागे नैंणौं मेरे ॥टेक॥
जब मन मेर सिखर चढ़ि बोल्या, गुरि का सब्द सुर धरिया ।
बिरह महाघण ऊलटि आयौ, डर डाबर सब भरिया ॥
घट मैं घटा उलटि करि अैसी, इहिं बिधि बोल्हरि आयौ ।
बरसै बिसुर बिसुर निसबासुरि, भाव भादौं झड़ लायौ ॥
यहु गाजै पुरवाई बाजै, धरतीपति धड़हड़ियौ ।
माँझलि राति पपीहौ बोल्यौ, आछि बांधि वौरड़ियौ ॥
बीजल एक बिरह कै ताँई, धुर दिसि खिंवै सु ठाँई ।
बषनां तिहिं बरिखा मैं भीजै, राम मिलण कै ताँई ॥९१॥
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हे रामराय ! तेरे दर्शन पाने के लिये मेरे दोनों नेत्रों से अश्रुओं की धारा बहने लगी है । जब मेरे मन की वृत्ति गुरु द्वारा प्रदत्त राम-नाम के साथ चारों घाटियों को लांघकर ब्रह्मरंध्र में पहुँच गई तब सम्पूर्ण शरीर में राम-नाम-सुर धरिया = अनहदनाद के रूप में परिवर्तित होकर बोलने = निनादित होने लगा ।
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विरह रूपी महाधन – संवर्तक मेघ पूर्ण शक्ति के साथ उमड़-घुमड़ कर बरसने लगे जिससे शरीर के नाना अवयव मन, बुद्धि, प्राण, इन्द्रियाँदि रूपी डर-डाबर = गड्डे, तालाब विरह रूपी जल से लबालब भर गये ।
घट = शरीर में विरह की घटाएँ उलटि करि = इसरीति से छायीं तथा इस प्रकार से बरसने लगीं जैसे कि भाद्रपद मास की वर्षा की अखंड झड़ी लग जाती है ।
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भाव रूपी भाद्रपद मास निसवासरि = रात-दिन प्रियतम के अमिलन जन्य दुख में झड़ी लगाकर बरसने लगा, बिसूर-बिसूर = विह्वल होकर रोने लगा । विरह रूपी बादल भयंकर गर्जना रूपी रुदन करते हैं । पूर्व की ओर से आने वाली हवा रूपी संत-महात्माओं का सत्संग, ज्ञान उसे और बढ़ाता है । धरतीपति = पहाड़ रूपी धीरज धड़हड़ियौ = धराशाही हो गया, डगमगा गया ।
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आधी रात्रि में पपीहा ‘पीव’ ‘पीव’ की ध्वनि अपने मुख को ऊपर की ओर करके ऊँचे स्वर में बोरिहड़ियौ = बोलने लगा । इस विरह को बेग देने के लिये विवेकरूपी बिजली धुरदिसि = सामने की और चमकती है । बषनां रामजी से मिलने के लिये ही इस विरह रूपी वर्षा में भीगता = सराबोर होता है ॥९१॥

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