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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*९. गुरु संयोग वियोग माहात्म्य का अंग ~ २९/३२*
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*केशर कनक कपूर मुक्त मन, यह पैदायश जोय ।*
*खेत नदी है केलि शुक्ति गुरु, ठाहर उतपति होय ॥२९॥*
केशर खेत में, स्वर्ण सुमेरू से आने वाली नदियों में, कपूर केले में, मोती सीप में उत्पन्न होता है, वैसे ही गुरु के संग से मन में ज्ञान उत्पन्न होता है ।
*पिंड प्राण बिन कुछ नहीं, सूखी काया काठ ।*
*त्यों अनुभव बिन अनुभवी, ज्यों पंडित बिन पाठ ॥३०॥*
प्राणधारी जीव के बिना यह शरीर शुष्क काष्ठ के समान कुछ भी सारयुक्त नहीं, पाठ स्मरण न हो तो पंडित कुछ नहीं, यथार्थ अनुभव न हो तो नाम मात्र का अनुभवी कुछ नहीं, वैसे ही गुरु संयोग बिना शिष्य कुछ नहीं ।
*रज्जब वपु वायक१ चले, परस्यो२ पूरा पीर३ ।*
*पर काया सु प्रवेश गुरु, मृतक शब्द शरीर ॥३१॥*
गुरु के शरीर से वचन१ चलते हैं, वे जिसके हृदय को स्पर्श२ करते हैं, वह पुरा सिद्ध३ हो जाता है । इस प्रकार गुरु मृतक शब्द रूप शरीर से अपने से भिन्न शिष्य के शरीर में प्रवेश करते हैं ।
*गुरु पंडित अक्षर शबद, आदम१ अपढ़ न लेश ।*
*रज्जब पैठे पीर२ संग, ठाहर सु प्रवेश ॥३२॥*
अक्षर ही गुरु है, शब्द ही पंडित है, अत: अक्षर और शब्दों को सभी जानते हैं, मानव१ किचिंत मात्र भी अपठित नहीं है फिर भी माया से परे ब्रह्म रूप स्थान में निर्विध्न प्रवेश करना होता है तब तो सिद्ध२ गुरु के संग से ही प्रवेश होता है अन्यथा नहीं ।
(क्रमशः)

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