रविवार, 12 अप्रैल 2026

*साच, उपदेश ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*दादू संशय आरसी, देखत दूजा होइ ।*
*भ्रम गया दुविधा मिटी, तब दूसर नाहिं कोइ ॥*
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*साच, उपदेश ॥*
लोगौ घर का मारै रे, गाँठि कौ राम बिसारै रे ॥टेक॥
घर का मारै राम बिसारै, जुड़ै पराया बाह्या । 
म्हे तौ याँहनैं पूजाँ नाहीं, हरि कै सरणैं आया ॥
याँहनैं सुधी नहीं रे साधौ, है कोई समझावै ।
राम नाम बिहूणी म्हाँनैं, तिल तिल बाइड़ आवै ॥
पैंडै जाताँ ऊजड़ ताकै, समझत नहीं गँवारा ।
हिन्दु तुरक जिन दोउ उपाया, सो एकै सिरजनहारा ॥
राम कह्याँ तैं नामौं तिरियौ, धू प्रहिलाद कबीरा ।
मूरिख मनिख राम नहिं जाणैं, सोचै नहीं सरीरा ॥
उड़तौ हंस बिलम नहिं लागै, तब यौ राम क्यूँ कहसी । 
बषनौं कहैं राम किन सुमरौ, पछितावौ मनि रहसी ॥८९॥
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“श्रेयान्स्वधर्मो विगुणः परधर्मात्स्वनुष्ठितात् । 
स्वधर्म निधनं श्रेयः परधर्मो भयावह ॥३/३५॥” 
गीता के उक्त श्लोक में जिस स्वधर्म एवं परधर्म की चर्चा है, उसकी उक्त पद में नहीं है । क्योंकि गीता में अर्जुन को क्षत्रियोचित गृहस्थधर्म को अंगीकार करके युद्धधर्म में प्रवृत्त होने को स्वधर्म तथा संन्यासी बनकर बन में रहते हुए भगवद्भजन करने चले जाने को परधर्म बताया है । 
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बषनांजी हिन्दूधर्म को स्वधर्म तथा मुस्लिमधर्म को परधर्म हिन्दुओं के लिये तथा मुस्लिमधर्म को स्वधर्म तथा हिन्दूधर्म को परधर्म मुस्लिमों के लिय बताते हैं । धर्म = उपासना पद्धति की भिन्नता के कारण एक दूसरा एक दूसरे को मारता है । वस्तुतः कोई भी दूसरे को नहीं मारकर अपनों को ही मारता है क्योंकि सभी एक ही परब्रह्म-परमात्मा के उपजाये हुए उसी के अंश हैं । बस, मन में भ्रम पाल लेते हैं कि हमने इतने दूसरे धर्म वालों को मार दिया । 
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श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं “मयैवैते निहताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन् ॥११/३३॥” सामने दिखने वाले समस्त शूरवीर पहले से ही मेरे द्वारा मारे हुए हैं । हे सव्यसाचिन् ! तू तो मात्र निमित्त बन जा । इसीप्रकार प्रत्येक शरीरधारी को एक न एक दिन मरना ही है । फिर क्यों ‘मैंने मार डाला’ कहकर मारने वाला बनकर हत्याजन्य पाप का भागी बना जाये । फिर निरपराध को मारना तो और भी बड़ा अपराध है । बषनांजी इसी बात को इस प्रकार कहते हैं ।
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लोग भ्रम के कारण अपनों को ही मार डालते हैं, परेशान करते हैं । मारने में इतने अधिक संलग्न हो जाते हैं कि गाँठि = निज-राम जो सभी में रम रहा है को ही विस्मरण कर बैठते हैं ? वस्तुतः कुछ स्वार्थी तत्वों के बहकावे में आकर अज्ञानी लोग उनसे जुड़कर उनके कहे अनुसार चलते हुए (बाह्या = बहाये हुए) अपनों को ही मारते रहते हैं । परिणामस्वरूप सभी में रमने वाले राम का भी विस्मरण कर बैठते हैं ? 
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बषनांजी कहते हैं, मैं तो इनके परामर्शों = उपदेशों को मानता नहीं हूँ क्योंकि मैंने तो परात्पर-परब्रहम-परमात्मा हरि की शरण का आश्रय ले लिया है । मेरे लिये तो सचराचर ही “सीयाराम मय सब जग जानीं । करहुँ प्रणाम जोर जुग पानी ।” एक परमात्मा का स्वरूप है । अतः मैं किससे विरोध करके किसको मारूँ तथा किससे प्रेम करके किसे न मारूँ । 
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हे सज्जन पुरुषों ! इन मूर्खों को इस वास्तविकता का बोध नहीं है । बताओ, ऐसा कोई है, जो इन्हें समझा सके । कदाचित् रामजी का नाम एक क्षण के लिये भी विस्मृत हो जाता है तो क्षण-क्षण, पल-पल मुझे उस परमात्मा के नाम-स्मरण की वायड़ = तलब आती है, नशा करने की सी हुड़क आती है । जबकि दूसरी ओर ये लोग है कि इन्हें एक दूसरे को मारने से ही फुर्सत नहीं है । 
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ये मूर्ख रास्ते पर चलते हुए भी रास्ते को छोड़कर ऊजड़ = टेढ़े-मेढ़े, अराजपथ पर चलने की सोचते हैं, चलते हैं । वास्तव में ये मूर्ख लोग राजपथ = निजधर्म तथा अराजपथ = परधर्म के यथार्थ मर्म को जानते-समझते ही नहीं है । हिन्दू और तुर्क दोनों को ही जिसने बनाया है, वह सृजनहार परमात्मा एक ही है । 
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यदि हम इतिहास को उठाकर देखें तो ज्ञात होता है, रामजी का राम नामक नाम का स्मरण करके हिन्दू नामदेव, ध्रुव और प्रहलाद मोक्षगामी हुए हैं तो मुस्लिम कबीर भी रामनाम स्मरण के बल पर ही मोक्षगामी हुए हैं । किन्तु मूर्ख मनुष्य रामजी के ऐसे अतुलनीय, अप्रमेय प्रभाव को नहीं जानते और इस बात का चिंतन नहीं करते कि सभी शरीरों में एक ही राम रम रहा है । 
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आत्मा शरीर में से किस समय निकलकर चली जायेगी, किसी को पता नहीं होता । अतः अंतसमय में रामजी के नाम का स्मरण किस प्रकार हो सकता है क्योंकि आत्मा को शरीर में से निकलने में जरा सी भी देर नहीं लगती । अतः “तस्मात् सर्वेषु कालेषु मामनुस्मर युष्य च ।” हर पल, हर क्षण परमात्मा का स्मरण करो जिससे कि अंत में भी उसकी स्मृति हो जाए । 
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बषनां कहता है, क्यों नहीं समय रहते ही रामजी के स्मरण करने का अभ्यास डाल लेते जिससे कि अन्तिम समय में पश्चाताप न रहे कि मैं भगवान् का भजन-ध्यान नहीं कर सका । 
“सो परत्र दुख पावही, सिर धुनि धुनि पछताहिं । 
कालहि कर्महि ईश्वरहिं, मिथ्या दोष लगाहिं ॥८९॥”

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