बुधवार, 29 अप्रैल 2026

*१०.विरह का अंग~ १३/१६*

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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*१०.विरह का अंग~ १३/१६*
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*दशवें कुल का नाग है, दरद सु देहि माँहिं ।*
*जन रज्जब ताके डसे, मंत्र रु मूली नाँहिं ॥१३॥*
नागों के दशवे कुल का नाग जिसे डसता है, वह उसके विष से बच नहीं सकता, उसके विष को दूर करने वाला न तो कोई मंत्र है और न कोई बूंटी है । वैसे ही जिसके हृदय में विरह का दर्द है, उसको दूर करने का भी मंत्र तथा बूँटी नहीं है । उसकी व्यथा तो प्रियतम के मिलने से ही मिटती है ।
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*रज्जब विरह भुवंग१ परि, औषधि हरि दीदार ।*
*बिन देखे दीरघ दुखी, तन मन नहीं करार२ ॥१४॥*
विरह रूप सर्प१ के काटने पर, हरि-दर्शन रूप औषधि उसके विष को उतार सकती है । हरि-दर्शन बिना विरही भक्त महान दुखी रहता है, उसके तन और मन में उत्साह पूर्वक कार्य करने की शक्ति२ नहीं रहती ।
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*भलका१ लागा भाव का, सेवक हुआ सु मार ।*
*रज्जब तलफै तब लगे, मिले न मारन हार ॥१५॥*
जब से भगवद्-विरह भावना रूप भाला१ मन के लगा है, तब से ही मन भगवत् प्राप्ति में बाधक कामादि शत्रुओं को अच्छी प्रकार मारकर भगवान् का सु सेवक हो गया है । अब यह तब तक तड़फता रहेगा जब तक भाला मारने वाले भगवान् दर्शन न देंगे ।
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*ज्यों विरहनी वर बीछुटे, बिहर१ गई तहिं काल ।*
*त्यों रज्जब तुम कारने, विपति माँहिं बेहाल ॥१६॥*
जैसै अपने स्वामी के बिछुड़ने पर वियोगिनी का हृदय तत्काल विदीर्ण१ होने लगता है, वैसे ही हे प्रभो ! हम विरहजनों में विरह-विपत्ति आ पड़ी है, हम आपके दर्शनार्थ अति व्याकुल हैं ।
(क्रमशः)

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