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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ५/८
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देह रूप ई ह्वै रह्यौ, देह आपकौं मानिं ।
ताही तें यह जीव है, सुन्दर कहत बखांनि ॥५॥
यह(आत्मा) जब देह को अपना मान कर उसमें अध्यास कर लेता है तो यह भी देहरूप हो जाता है । तब यही लोकव्यवहार में ‘जीव’ कहलाता है ॥५॥
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देह भिन्न हौं भिन्न हौं, जब यह करै बिबेक ।
सुन्दर जीव न पाइये, होइ एक कौ एक ॥६॥
जब यह आत्मा विवेकपूर्वक शास्त्रानुकूल चिन्तन मनन करता है तब इस को ज्ञान(समझ) होता है -'मुझ से देह भिन्न है तथा देह से भिन्न हूँ ।' इस ज्ञान के होने पर, जीव एवं ब्रह्म की एकता हो जाती है । अर्थात जीव की कोई पृथक् स्थिति नहीं रह जाती ॥६॥
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क्षीण रु पुष्ट शरीर है, शीत उष्ण तिहिं लार ।
सुन्दर जन्म जरा लगै, यह षट देह विकार ॥७॥
इस शरीर की भिन्न स्थिति है । यह कभी क्षीण होता है तो कभी पुष्ट हो जाता है; क्यौंकि सर्दी गर्मी, जन्म मरण, एवं छह भाव विकार१(देहविकार) इस के साथ लगे रहते हैं ॥७॥ (१ छह भावविकार – १.उत्पत्ति(जायते), २.सत्ता(अस्ति), ३.विपरिणमन = परिवर्तन(विपरिणमते), ४.वृद्धि(वर्धते), ५.क्षय(क्षीयते), एवं ६,नाश(नश्यति) ।)
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क्षुधा तृषा गुन प्रांन कौं, शोक मोह मन होइ ।
सुन्दर साक्षी आतमा, जानै बिरला कोइ ॥८॥
वस्तुतः भूख प्यास लगना प्राण का धर्म है, शोक एवं मोह आदि मन के धर्म हैं, आत्मा तो इन सब का साक्षिमात्र है - इस बात को कोई ज्ञानी ही समझ पाता है ॥८॥
(क्रमशः)

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