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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ४५/४८
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काष्ट सु जोरे जुगति करि, कीया रथ आकार ।
हलन चलन जातें भया, सो सुन्दर ततसार ॥४५॥
जैसे कोई कुशल रथकार काष्ठ के खण्डों को जोड़ जोड़ कर उन को 'रथ'(चार पहियों की गाड़ी) का आकार दे दे, जिसमें चलन क्रिया होने लगे तो उस की भी कोई सत्ता नहीं है । वह भी उक्त पंच महाभूतों का सङ्घात ही है१ ॥४५॥ {१ बौद्ध दार्शनिकों में भी, देह की असत्यता-सिद्धि में, यह 'रथ' का उदाहरण बहुत प्रसिद्ध है । उनकी यह गाथा बहुत प्रसिद्ध है -
"यथा हि अङ्गसम्भारा, होति सद्दो 'रथो' इति ।
एवं खन्धेसु सन्तेसु, 'पुग्गलो' होति विस्सुतो ॥"-
मिलिन्दपञह, पृ० ३४; सं० नि० ५/१०/६ यहाँ 'पुग्गल' (पुद्गल) का अर्थ 'देह' (भूतसङ्घात) ही है ।}
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तत्व कहे इकतीस लौं, मत जू जुवा बखांनि ।
सुन्दर जल कौनैं पिया, मृगतृष्णा घर आंनि ॥४६॥
तत्त्वों की सङ्ख्या : विभिन्न शास्त्रकारों ने अपने अपने मत से इन तत्त्वों की संख्या ३१(इकतीस) बतायी है । ये सभी तत्त्व ब्रह्म(चेतन) के विना वैसे ही निःसार हैं जैसे मृगमरीचिका में दिखायी पड़ने वाला जल । क्या किसी ने आज तक मृगमरीचिका के जल से अपनी प्यास बुझायी है ! ॥ [५ + तत्त्व (महाभूत) + ५ तन्मात्राएँ + ५ ज्ञानेन्द्रिय + ५ कर्मेन्द्रिय + ४ अन्तःकरण + ३ गुण + १ प्रकृति + १ जीव + १ ईश्वर + १ परमात्मा (ब्रह्म) = ३१] ॥४६॥
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देह स्वर्ग अरु नरक है, बंध मुक्ति पुनि देह ।
सुन्दर न्यारौ आतमा, साक्षी कहियत येह ॥४७॥
स्वर्ग एवं नरक, बन्ध या मुक्ति में देह(जनित कर्म) कारण है । आत्मा इन सब से भिन्न हैं । इसको इन सब का साक्षी ही समझना चाहिये ॥४७॥
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सुन्दर नदी प्रवाह मैं, चलत देखिये चन्द ।
तैसें आतम अचल है, चलत कहैं मतिमंद ॥४८॥
प्रतिबिम्ब के कारण भ्रम : जैसे नदी के प्रवाहित जल में पतित चन्द्रमा के प्रतिबिम्ब को चलता हुआ देखकर कोई जडमति(अज्ञ) पुरुष चन्द्रमा को ही चलता हुआ समझ लेता है, वैसे ही देहस्थ आत्मा भी 'अचल' है; परन्तु बुद्धिहीन पुरुष उस आत्मा को, देहसंसर्ग के कारण, 'चल' समझने लगते हैं ॥४८॥
(क्रमशः)

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