शनिवार, 9 मई 2026

*मन-वशीकरण-उपाय ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*जहाँ मन उठि चलै, फेरि तहां ही राखि ।*
*तहाँ दादू लैलीन करि, साध कहैं गुरु साखि ॥*
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*मन-वशीकरण-उपाय ॥*
हेरिले फेरिले घेरिले पाछौ । 
राम भगति करि होइ मन आछौ ॥टेक॥
जाणि ताणि अपूठौ आणि । जै बाणैं तौ हरि स्यूँ बाणिक ॥
बावरौ भयौ कि लागी बाइ । रीति तलायाँ झूलण जाइ ॥ 
साध संगति मैं रहु रे भाई । बषनां तूँ नैं राम दुहाई ॥११४॥
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मन के अधीन मानव मात्र को उपदेश देते हुए कहते हैं, मन एक जगह टिकता नहीं है । अतः सर्वप्रथम उस तत्त्व को ढूंढ लेना चाहिये जिस पर वह एक बार स्थिर हो जाने पर पुनः अस्थिर न हो ? अतः सर्वप्रथम इसके लिये आलम्बन ढूंढ लेना चाहिये । 
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चंचल होने से वह बार-बार सांसारिक विषयों की ओर दौड़ता है क्योंकि जन्म-जन्मान्तरों से इसे उनमें ही रमण करने की आदत पड़ी हुई है । अतः इसे बार-बार उन विषयों से फेर = उल्टा ला लाकर स्वात्मतत्त्व चिंतन में लगा । 
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जब बार-बार मोड़कर लाने से यह कुछ-कुछ स्थिर होने लगे तब सर्वप्रथम जिस तत्व को ढूंढा था उसमें इसको घेरि = पूर्णरुपेण संयोजित कर दे । चारों ओर से इसको हटाकर एकतत्व पर केन्द्रित कर दे । यही प्रक्रिया है, मन को वश में करने की । 
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योगशास्त्राकार ने भी यही प्रक्रिया बताई है “अभ्यास वैराग्याभ्यां तन्निरोधः ।” गीता में श्रीकृष्ण ने भी इसी प्रक्रिया का उल्लेख किया है “असंशयं महाबाहो मनो दुर्निग्रहंचलं । अभ्यासेन तु कौन्तेय वैराग्येण च गृह्यते ॥” वह आलम्बन क्या है जिसकी चर्चा ‘हेरि ले’ से की गई है । वह तत्व है ‘राम’ और उस राम को प्राप्त करने का साधन भक्ति है । 
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अतः कहते हैं, मन को राम की भक्ति में लगा दे ताकि वह चंचलता छोड़कर परमात्मतत्व में स्थिर होकर अच्छा हो जाये । मन को विषयों में बारबार जाता हुआ जानकर विवेक-वैराग्य रूपी चाबुक से बार-बार ताणि=समझा-बुझाकर स्वात्मतत्त्व रूपी आलम्बन पर पुनः पुनः वापिस लाकर स्थिर कर । 
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यदि हे मन ! तुझे किसी से बाणि = मित्रता करनी ही है, किसी में रमना ही है तो परात्पर-परब्रह्म-परमात्मा से ही मित्रता करके क्यों नहीं उसी में रमण करता है । अरे ! तू पागल हो गया है अथवा तुझे भूत-प्रेत लग गये हैं जो सूखी तलाई में स्नान करने जा रहा है । 
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अर्थात् परमात्मा रूपी सजल तालाब को छोड़कर विषयभोग रूपी तलाई में रमण करने जा रहा है । हे भाई ! हे सुहृद ! तू सदैव साधुओं = सज्जनों की संगति में रह । साधुसंगति को छोड़कर विषयवासनाओं में जायेगा तो तुझे बषनां की ओर से रामजी की सौगंध है ॥११४॥ 

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