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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*कामधेनु कै पटंतरे, करै काठ की गाइ ।*
*दादू दूध दूझै नहीं, मूरख देइ बहाइ ॥*
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*भ्रमविध्वंश*
उपिलौ मारै न माँहिलौ तारै ।
पंडित होइ सु अरथ बिचारै ॥टेक॥
स्यंघ कहैं पणि पोरिष नांहीं ।
बसै पँखेरुवा मुहड़ा मांहीं ॥
साध कहैं सो तौ यहु नांहीं ।
घड़िया बैठा घड़िया मांहीं ॥
अलख निरंजन की करि आस ।
बषनां याँह कौ किसौ बिसास ॥१०७॥
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इस पद में बषनांजी ने सगुणमार्गियों के उस कथन का खंडन किया है जिसमें कहा गया है.....
“न देवोविद्यते काष्ठे न पाषाणे न मृण्मये ।
भावोहि विद्यते देवो तस्माद्भावोहि कारणं ॥”
परमात्मा काष्ठमय, पाषाणमय अथवा मृण्मयमय नहीं है । साधक इनमें परमात्मा के होने की भावना करता है । इसीलिए इन्हें भगवद्विग्रह कहा जाता है और इसलिये भाव की प्रधानता है । बषनांजी कहते हैं, न ऊपरी शक्ति किसी को मार सकती है और न अंदरूनी शक्ति किसी को जिला सकती है ।
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एक निर्गुण-निराकार परमात्मा में ही जिलाने और मारने की शक्ति है । वही सबको पैदा करता है, सबका पालन-पोषण करता है तथा अंत में वही सबका संहार भी करता है । तदितर ऊपर-नीचे के देवी-देव, भूत-प्रेत, यंत्र-मंत्रों में यह शक्ति नहीं है । जो वास्तविक पंडित = बुद्धिमान होते हैं वे इसी प्रकार का विचार करते हैं । उदाहरणार्थ, कहने के लिये किसी को ‘सिंह’ कहते हैं किन्तु यदि उसमें पौरुषत्व = बल सिंह के समान नहीं है तो उसको सिंह कहना व्यर्थ है ।
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इसी प्रकार यदि पंखों वाले पक्षी पिंजरे में बसते हों तो उनकी पंखों का क्या लाभ । वे उड़ नही सकते । वस्तुतः साधु-संत जिस परमात्मा का कथन करते हैं वह परमात्मा स्वयं द्वारा रचित तथा भावित इन पत्थर खंड़ों में (घड़िया = बनाये हुआ में) नहीं है ।(पहला घड़िया शब्द निर्मित करने का अर्थ व्यंजित करता है जबकि दूसरा घड़िया = भावना से भावित, वेदमंत्रों के द्वारा प्राणप्रतिष्ठित अर्थ द्योतित करता है ।)
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यदि कोई घर में लकड़ी की गाय बनाकर रख ले और उसमें भावना करे कि यह वास्तविकता में गाय है तो क्यों नहीं वह गाय दूध देती है और क्यों नहीं गाय की भावना करने वाला उक्त व्यक्ति उस दूध-दही से निकले घृत से चुपड़ी रोटी खाता है । क्यों लूखी रोटी खाता है । वास्तव में काष्ठ में दूध देने वाली गाय नहीं हो सकती है । अतः उसमें भावना करना व्यर्थ है । आशा तो मात्र एक निरंजन-निराकार-परमात्मा की करनी चाहिये । वही ‘कर्तुंअकर्तुंअन्यथाकर्तुंसमर्थ’ है । अन्यों में विश्वास करना व्यर्थ है ॥१०७॥

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