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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग १७/२०
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सुन्दर सिर को सीस है, प्राननि कौ है प्रांन ।
कहत जीव कौं जीव सब, शास्तर वेद पुरांन ॥१७॥
इसी प्रकार इस देह के शिर एवं प्राण का आधार भी तूं ही है । तेरे सहारे ये दोनों भी अपना अपना व्यापार कर पाते हैं । इसी लिये वेद, पुराण आदि सभी शास्त्र इस शरीर को, इस में तुम्हारी स्थिति तक ही 'जीवित' कहते हैं ॥१७॥
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सुन्दर तू चैतन्य घन, चिदानंद निज सार ।
देह मीन असुच्चि जड, बिनसत लगै न बार ॥१८॥
हे आत्मा ! तूं चेतनरूप है, सत् चित् आनन्दमय है, मूल तत्त्व है । इसके विपरीत यह शरीर तो विकारों से परिपूर्ण, अतएव अशुचि एवं जड है । इस को विनष्ट होने में कोई विलम्ब नहीं लगता ॥१८॥
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सुन्दर अविनाशी सदा, निराकार निहसंग ।
देह बिनश्वर देखिये, होइ पलक मैं भंग ॥१९॥
श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - हे आत्मा ! तुम तो नित्य, अविनाशी निराकार एवं सङ्गरहित हो; जब कि तुम्हारा यह शरीर क्षणमात्र में ही विनष्ट हो जाने वाला है अतएव विनाशी कहलाता है ॥१९॥
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सुन्दर तूं तौ एकरस, तोहि कहौं समुझाइ ।
घटै बढै आवै रहै, देह बिनसि करि जाइ ॥२०॥
अथ च, तुम तो सदा एकरस(एक भाव में) रहने वाले हो; जब कि यह शरीर कभी घटता है, कभी बढ़ता है, कभी आता है, कभी जाता है । इस प्रकार यह देह निरन्तर विनशनशील है ॥२०॥
(क्रमशः)

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