रविवार, 10 मई 2026

*मनमुखी शिष्य ॥*

🌷🙏 🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*गुरु अंकुश मानैं नहीं, उदमद माता अंध ।*
*दादू मन चेतै नहीं, काल न देखे फंध ॥*
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*मनमुखी शिष्य ॥*
गुर बरजै सिष खोटा खाइ । जनम अमोलिक यौंही जाइ ॥टेक॥
जूवौ चोरी बरजी दोइ । परत्रिय संग करै जिनि कोइ ॥
सीख दियंताँ मानैं रोष । कुवै पड़ तौ किहिनैं दोस ॥
घड़ै चीकणैं जल की धार । भीतर भेदी नहीं लगार ।
जेती कही तेती बीसरी । इहिं कानि सुणी वहि कानि नीसरी ॥
सुणताँ कथा न कीयौ चेत । अठै नहीं कहींठै हेत ॥
ज्यूँ बूझ्या त्यूँ या गति भई । नौसै कीड़ी इहि बिलि गई ॥
सीष न मानैं येक लगार । ते सिख बूडा काली धार ॥
बषनां सीख न मानैं घणाँ । ते पाईसैं किया आपणाँ ॥११५॥
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मनमुखी शिष्य के आचार-विचारों का चित्रण करते हुए बषनांजी कहते हैं । गुरुमहाराज गलत मार्ग पर चलने के लिये मना करते हैं किन्तु कुशिष्य कुमार्ग पर ही चलता है । उसका अमूल्य मानव तन योंही व्यर्थ चला जाता है । जुवा खेलना, परस्वत्वापहरण रूपी चोरी करना-इन दोनों ही कुकर्मों को न करने के लिये कहा गया है । परस्त्रीगमन कोई भी न करे, यह भी विधि वाक्य है ।
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किन्तु मनमुखियों को उक्त शिक्षा जब दी जाती है तब वे इनको मानने के बजाय उल्टे बुरा मानते हैं, क्रोध करते हैं । बषनांजी कहते हैं कि यदि कोई जानबूझकर ही कूवे में पड़े तो दोष किसको दिया जाये ? अर्थात् किसी अन्य को नही दिया जा सकता । दोष तो स्वयं जानबूझकर गिरने वाले का ही माना जायेगा ।
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मनमुखी शिष्य की स्थिति ठीक वैसी ही होती है जैसी चिकने घड़े पर गिरने वाली जल की धरा की होती हैं जो गिरकर भी उसके अंदर प्रवेश नहीं कर पाती है । ऐसा कुशिष्य उन समस्त अच्छी बातों को विस्मृत कर देता है जितनी उससे कही जाती है । वह इस कान में सुनना है और दूसरे कान में से निकाल देता है ।
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सत्संग में बैठाकर ज्ञानचर्चा सुनाते समय भी चैतन्य = सावधान होकर ज्ञानचर्चा नहीं सुनी । वस्तुतः शरीर वहाँ था किन्तु मन किसी और तत्व के चिंतन में लगा था, कहीं और था । जब सुने हुए के बारे में सुनाने वाला पूछता है, भाई ! आपने क्या सुना; तब कुशिष्य की ठीक वैसी ही शून्य सी स्थिति होती है जैसे किसी बिल में नौ सौ चींटी घुसें फिर भी वहाँ जरासी भी आवाज न हो ।
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जो शिष्य गुरु की किञ्चितमात्र भी शिक्षा नहीं मानते वे काली धार = जन्म-मरण रूपी भयानक जलधारा में डूब मरते हैं । बषनां कहता है, जो बहुत से कुशिष्य गुरुमहाराज की सुशिक्षा नहीं मानते वे अपना किया स्वयं ही भुगतते हैं ॥११५॥

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