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🌷卐 सत्यराम सा 卐🌷
साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das
श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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१०. विरह का अंग~ ५३/५६
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शूर सती का जुध जलन, एक हि समय सु नाश ।
ता ऊपर चार्यों पहर, पहले किये विनाश ॥५३॥
वीर का युद्ध के द्वारा और सती नारी का चिता में जलने के द्वारा एक समय ही नाश होता है किन्तु उस विरही पर तो चारों पहर ही विरह रूप विपति पड़ी रहती है, उसके सुखों का तो पहले ही विरह विनाश कर देता है ।
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रज्जब कायर कामिनी, रही विपति के रंग ।
सती चली सल१ चढ़न को, पहर पटम्बर अंग ॥५४॥
डरपोक नारी सती न होकर पति वियोग का दु:ख भोगने के लिये रह जाती है, किन्तु सती नारी तो शरीर पर श्रेष्ठ वस्त्र पहनकर चिता१ पर चढ़ने को चल पड़ती है । इसी प्रकार भगवद-विरही भक्त विरहाग्नि से नहीं डरते अभक्त ही डरते हैं ।
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रे प्राणी पति परिहर्या, बेहरि जाय क्यों नांहिं ।
जन रज्जब ज्यों जल गये, पंक२ तिड़ी३ सर१ माँहिं ॥५५॥
हे प्राणी तूने परमात्मा रूप स्वामी को त्याग दिया है, अत: जैसे तालाब१ का जल सूखने से कीचड़२ फट३ जाता है वैसे ही प्रभु वियोग से तेरा हृदय क्यों नहीं फट जाता ?
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चकई ज्यों चक्रित१ भई, रैनी परी बिच आय ।
जन रज्जब हरि पीव को, क्यों कर परसौं२ जाय ॥५६॥
रात्रि आ जाने से चकवा से चकवी का वियोग होने पर जैसे चकवी चकित होती है वैसे ही आत्मा का अज्ञान होने से हरि-वियोग से विरही की बुद्धि चकित१ होकर सोचती है कि - मैं अपने प्रियतम हरि से किस साधन मार्ग से जाकर मिल२ सकूंगी ? सूर्योदय पर चकवा चकवी का मिलन होता है, वैसे ही आत्म ज्ञानोदय पर विरही और भगवान का मिलन होता है ।
(क्रमशः)

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