रविवार, 10 मई 2026

*१०. विरह का अंग~ ५७/५९*

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
.
*१०. विरह का अंग~ ५७/५९*
.
*चकवी को चकवा मिले, बीते यामिनि१ याम२ ।* 
*रज्जब रजनी आयु बिहाई, मिले न आतम राम ॥५७॥* 
रात्रि१ की चारों पहर२ व्यतीत होने पर चकवी को तो चकवा मिल जाता है किन्तु हमारी आयु-रात्रि व्यतीत होने पर भी हमें अपने आत्मास्वरूप राम नहीं मिल नहीं मिल पा रहे हैं अत: खेद है । 
.
*विरह अग्नि एकै सबहुं, हृद१ हाँडी सु अनेक ।* 
*भाव भिन्न भोजन विविध, रज्जब रंधैहिं विवेक ॥५८॥* 
हृदय१ रूप हँडिया बहुत हैं, प्रेमपात्र संबन्धी भाव रूप भोजन भी सबके विचित्र प्रकार के हैं, उन भाव-भोजनों को पकानेवाला विरह रूप अग्नि एक ही है किन्तु उन भावों को विवेकपूर्वक पका कर हरि को प्राप्त करना ही विशेषता है । 
.
*एक विरह बहु भांति का, भाव भिन्न बिच होय ।* 
*रज्जब रोवे राम को, सो जन बिरला कोय ॥५९॥* 
विरह तो एक ही प्रकार का होता है किन्तु विरहीजनों के मन में प्रेम-पात्र सम्बन्धी भाव विभिन्न होते हैं अर्थात भगवद् भिन्न के भी विरही होते हैं किन्तु वह जन कोई बिरला ही होता है जो रात्रि दिन भगवान् के लिये ही रोता है ।
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें