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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग ४९/५२
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बहुत सुगंध द्रुगंध करि, भरिये भाजन अंबु ।
सुन्दर सब मैं देखिये, सूरय कौ प्रतिबिंबु ॥४९॥
आत्मा की समानता : जैसे किसी पात्र में भले ही सुगन्धित जल भरा हो या किसी पात्र में दुर्गन्धमय; परन्तु दोनों में सूर्य का प्रतिबिम्ब तो समान भाव से ही दिखायी देता है ॥४९॥
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देह भेद बहु विधि भये, नाना भांति अनेक ।
सुन्दर सब मैं आतमा, बस्तु बिचारैं एक ॥५०॥
आत्मा की एकता : इस संसार में प्राणियों के देह विविध प्रकार के या नाना रूप में दिखायी देते हैं; परन्तु वहाँ वस्तुतत्त्व के विचार की दृष्टि से आत्मा की सत्ता सर्वत्र एक ही दिखायी देती है ॥५०॥
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तिलनि माहिं ज्यौं तेल है, सुन्दर पय मैं घीव ।
दार माहिं है अग्नि ज्यौं, देह माहिं यौं सीव ॥५१॥
आत्मा की व्यापकता : लोक में जैसे हम देखते हैं कि तिलों में तैल, दूध में घी, या काष्ठ में अग्नि सर्वत्र व्याप्त रहती है; उसी प्रकार, यह प्राणियों के देहों में यह शिवस्वरूप(मङ्गलमय) ब्रह्म सर्वत्र व्यापक है ॥५१॥
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फूल माहिं ज्यौं बासना, इक्षु माहिं रस होइ ।
देह माहि यौं आतमा, सुन्दर जानै कोइ ॥५२॥
या जैसे फूलों में गन्ध, ईख में रस सर्वत्र व्याप्त रहता है; उसी प्रकार इस आत्मा को भी सभी प्राणियों की देह में व्याप्त समझना चाहिये ॥५२॥
(क्रमशः)

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