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*महात्मा कविवर श्री सुन्दरदास जी, साखी ग्रंथ*
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२४. सांख्य ज्ञान कौ अंग २५/२८
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सूक्षम तें सूक्षम परै, सुन्दर आपुहि जांनि ।
तो तें सूक्षम नांहिं कौ, याही निश्चय आंनि ॥२५॥
श्रीसुन्दरदासजी अपनी आत्मा को समझा रहे हैं - हे आत्मन् ! अभी बतायी गयी गणनाओं में सिद्ध सूक्ष्मतम तत्त्व से भी तुम पर(अग्र) हो । यही निश्चित समझ लो कि यहाँ तुम से सूक्ष्मतम तत्त्व अन्य कोई नहीं है ॥२५॥
(तु०- भगवद्गीता -अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः-८/९) ॥
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इन्द्रिय मन अरु आदि दे, शब्द न जानै तोहि ।
सुन्दर तौतें चपल ये, तूं इनितें क्यौं होहि ॥२६॥
हे आत्मन् ! इन्द्रिय या मन आदि के साथ तो तुम्हारी एक अंश की भी समानता नहीं है । वे तो सभी तेरी अपेक्षा बहुत अधिक चञ्चल(चपल) है; जब कि तूं उन सब की अपेक्षा सर्वथा शान्त है । अतः इन में तुम्हारी गणना कैसे हो सकती है ! ॥२६॥
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धूलि धूम अरु मेघ करि, दीसै मलिनाकाश ।
सुन्दर मलिन शरीर संग, आतम शुद्ध प्रकाश ॥२७॥
यद्यपि आकाश स्वभावतः स्वच्छ एवं निर्मल होता है; परन्तु वह धूलि, धूम या बादलों के कारण आवृत या मलिन दीखता है, ऐसे ही शुद्ध तेजोमय आत्मा भी, मलिन देह का सङ्ग कर, मलिन दिखायी देता है ॥२७॥
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देहनि कै ज्यौं द्वार मैं, पवन लिपै कहुं नाहिं ।
तैसैं सुन्दर आतमा, दीसै काया माहिं ॥२८॥
जैसे प्राणियों के देह में, देह की अपेक्षा आकाश, पवन आदि पदार्थ सूक्ष्म होने के कारण न कहीं लिप्त होते हैं और न कहीं रुकते ही हैं; उसी प्रकार श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं कि आत्मा भी, अतिशय सूक्ष्म होने के कारण, देह में न कहीं लिप्त होता है और न कहीं रुकता ही है ॥२८॥
(क्रमशः)

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