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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*बखनां~वाणी, संपादक : वैद्य भजनदास स्वामी*
*टीकाकार~ब्रजेन्द्र कुमार सिंहल*
*साभार विद्युत संस्करण~Tapasvi @Ram Gopal Das*
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*सतगुरु बरजै सिष करै, क्यूँ कर बंचै काल ।*
*दहदिश देखत बह गया, पाणी फोड़ी पाल ॥*
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*कृतघ्नशिष्य ॥*
कलि ब्यापी त्याँहनैं ब्यापी ।
गुर तैं पलटि दूसरा हूवा, आपौ थापै पापी ॥टेक॥
ज्ञान सिखाया ध्यान सिखाया, पढिया पोथी पाटी ।
गुरि जाण्यौ थौ सेवा करसी, सिख ले दौड्यौ लाठी ॥
गुर की भेट भूंगडा मेल्है, सिख नैं लोंग सुपारी ।
जै बाबौ सिख स्वामजी कौ, माता सिखि छै म्हारी ॥
कीयौ कृत्य परायौ मेटै, पलट्या उलटी धारी ।
धरती कहै कृत्यघण सेती, इहि हूँ भार्याँ मारी ॥
दोइ दोइ गुराँ दोइ दोइ जीभाँ, दोइ दोइ दुरमति वाला ।
सटक्या फिरै साँप की नाँई, बाहरि भितरि काला ॥
गुर सूँ हेत भाव नहिं कोई, सिख साखा सूँ मोहा ।
बषनौं कह ते लूणहरामी, साधन ही सैं द्रोहा ॥१०९॥
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जो कृतघ्न शिष्य गुरुमहाराज से विमुख होकर अपने महत्त्व की स्थापना करते हैं, उन्हें निश्चय ही कलियुग व्याप गया है; उन पर कलियुग प्रभावी हो गया है । गुरुमहाराज ने यह जानकर कि पढ़-लिखकर शिष्य सेवा करेगा, सेवा कराने में लालच में आकर गुरु ने शिष्य को ज्ञान सिखाया, परमात्मा का ध्यान करना सिखाया, पुस्तकें पढ़ना सिखाया, लिखना सिखाया किन्तु शिष्य ने सेवा तो कुछ की नहीं उल्टे गुरु की लट्ठी को ही ले दौड़ा (गुरु की आय के स्त्रोत रूप लाठी को ही ले भागा)।
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कृतघ्नशिष्य गुरुमहाराज को सिके चने = भूंगड़ों की भेंट चढ़ाता है जबकि शिष्यों को लौंग सुपारी की बक्षीस करता है । अर्थात् गुरुमहाराज का माहात्म्य कम करता है तथा स्वयं की प्रतिष्ठा बढ़ाता है । कोई जब उससे पूछता है कि तुम्हारा पिता ही जब स्वामीजी का शिष्य है तो तू भी तो उनका शिष्य हुआ कि नहीं हुआ । तब वह कृतघ्न शिष्य कहता है, ऐसा है तो क्या हो गया, माता तो मेरी ही शिष्या है ।
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कृतघ्नशिष्य दूसरों के अच्छे कार्यों को मिटा देने को तत्पर रहता है । जो उसके प्रति उपकार करते हैं पलटकर उनका वह अपकार ही करता है । ऐसे कृतघ्नी लोगों को अपने ऊपर रहते देखकर पृथिवी कहती है, मुझे ऐसे ही कृतघ्न पापियों ने अपने भार से बोझिल कर रखी है । संसार में असली नकली दो प्रकार के गुरु हैं । शरीर में दो प्रकार की एक रामनाम स्मरण करने वाली तथा दूसरी जागतिक वार्तालाप करने वाली जिव्हाएँ हैं ।
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इसी प्रकार दो प्रकार की दुर्मति = दुर्बुद्धि = कृतघ्न लोग होते हैं जो संसार में माता-पिता-गुरु-बन्धु-बांधवों का अपमान करते हैं तथा परमार्थ में परमात्मा का भजन नहीं करके परमात्मा की अवहेलना करते हैं । ऐसे मानव सर्प की भाँति हैं जो बाहर-भीतर दोनों ही रूप में काले है तथा धन, मान, प्रतिष्ठा के लिये इधर-उधर दौड़ते फिरते हैं । कृतघ्न शिष्य गुरु के प्रति किंञ्चितमात्र भी श्रद्धा-प्रेम नहीं रखता जबकि शिष्यगणों से मोह = रागात्मक सम्बन्ध बनाकर रखता है क्योंकि उनसे सम्बन्ध रखने से उसे धन, मान, प्रतिष्ठा मिलती है । बषनां कहता है ऐसे शिष्य निश्चय ही लूणहरामी = कृतघ्न हैं, जो साधन = सज्जनपुरुषों से, सुहृदयों से अकारण ही वैर करते हैं ॥१०९॥

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