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🌷🙏 *卐 सत्यराम सा 卐* 🙏🌷
*साभार विद्युत संस्करण ~ Tapasvi @Ram Gopal Das*
*श्री रज्जबवाणी टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥*
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*११. एकांगी प्रीति का अंग ~५/८*
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*देखहु विरह विवेक बिन, उपज्या अहमक१ अंग२ ।*
*दीपक के दिल ही नहीं, रज्जब पचन३ पतंग ॥५॥*
देखो, दीपक के तो हृदय भी नहीं है फिर भी मूर्ख१ पंतग के शरीर२ में बिना विवेक दीपक का प्रेम उत्पन्न हो जाता है । इससे दीपक के विरह से व्यथित होकर पंतग दीपक की अग्नि में ही जल३ मरता है ।
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*रज्जब माया ब्रह्म दिशि, जीव आप सौं जाय ।*
*उभय१ सु वेपरवाह वे, नर देखो निरताय ॥६॥*
हे नरो ! विचार करके देखो तो ज्ञात होगा, जीव अपने आप ही माया तथा ब्रह्म की और जाते हैं माया और ब्रह्म तो दोनों१ ही बेपरवाह हैं, उन्हें जीवों की आवश्यता नहीं ।
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*रज्जब जलना मड़े१ संग, त्यों एकांगी प्रीत ।*
*दुख सुख की पूछे नहीं, यह देखो विपरीत ॥७॥*
जो दु:ख की बात नहीं पूछता उस मुरदे१ के साथ जलने के समान ही एकांगी प्रीति है । देखो, इसका फल अपने से विपरीत ही दु:ख ही होता है ।
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*औषधी कीजे आयु बिन, सो लागे कोइ नाँहिं ।*
*त्यों एकांगी प्रीति है, समझ देख मन माँहिं ॥८॥*
मन में विचार करके देखो, आयु समाप्त होने पर कटु कषायादि औषधि खाने से कोई लाभ नहीं, दु:ख ही होता है, वैसे ही एकांगी प्रीति से कोई लाभ नहीं दु:ख ही होता है ।
(क्रमशः)
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